चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 397, कुल 639 में से
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अ० २८] सूत्रस्थानम् ३७३ तथा शरीर में चिरकाल से जड़पकड जाने पर, शंख आदि दृढ प्राणाशयों में स्थित होने से, मर्मस्थानों को पीड़ित करने से बहुत दुःख देने के कारण असाध्य होने से, शीघ्र विकार उत्पन्न करने से अपथ्य बलवान् बन जाता है। इसी प्रकार बहुत मोटा, बहुत कृश, जिनके मांस, रक्त, अस्थि, ढीले, निर्बल हो गये हों जो विषम शरीर वाले हैं, जो असात्म्य आहार को सेवन करने वाले, थोड़ा खाने वाले, अल्प सत्त्व वाले शरीर रोगों को सहन नहीं कर सकते। इनके विप- रीत गुणों वाले शरीर व्याधि को सहन कर सकते हैं। इसलिये अपथ्य आहार, दोष शरीर की विशेषता से रोग मृदु, दारुण, शीघ्र होने वाले, अथवा देर में होने वाले होते हैं। इसलिये हे अग्निवेश ! वात, पित्त, कफ विशेष स्थानों में कुपित होकर भिन्न-भिन्न प्रकार के रोगों को उत्पन्न करते हैं ॥ ५-६ ॥ तत्र रसादिषु स्थानेषु प्रकुपितानां दोषाणां यस्मिन् यस्मिन् स्थाने ये ये व्याधयः संभवन्ति तांस्तान् यथावदनुव्याख्यास्यामः ॥ ७ ॥ अश्रद्धा चारुचिश्चास्य वैरस्यमरसज्ञता । हृल्लासो गौरवं तन्द्रा साङ्गमर्दो ज्वरस्तमः ॥ ८ ॥ पाण्डुत्वं स्रोतसां रोधः क्लैब्यं सादः कृशाङ्गता । नाशोऽग्नेरयथाकालं वलयः पलितानि च ॥ ९ ॥ रसप्रदोषजा रोगा, वक्ष्यन्ते रक्तदोषजाः । कुष्ठ-वीसर्ष-पिडका रक्तपित्तमसृग्दरः ॥ १० ॥ गुदमेढ्रास्यपाकश्च प्लीहा गुल्मोऽथ विद्रधी । नीलिका कामला व्यङ्गः पिप्लवस्तिलकालकाः ॥ ११ ॥ दद्रुश्चर्मदलं श्वित्रं पामा कोठास्रमण्डलम् । रक्तप्रदोषाज्जायन्ते, शृणु मांसप्रदोषजान् ॥ १२ ॥ अधिमांसार्बुदं कील-गल-शालूक-शुण्डिकाः । पूतिमांसालजी-गण्ड-गण्डमालोपजिह्विकाः ॥ १३ ॥ विद्यान्मांसाश्रयान्, मेदःसंश्रयांस्तु प्रचक्ष्महे । निन्दितानि प्रमेहाणां पूर्वरूपाणि यानि च ॥ १४ ॥ अध्यस्थि-दन्त-दन्तास्थि-भेदशूलं विवर्णता । केश-लोम-नख-श्मश्रु-दोषाश्चास्थिप्रकोपजाः ॥ १५ ॥ रुक् पर्वणां भ्रमो मूर्च्छा दर्शनं तमसो मताः । अरुषां स्थूलमूलानां पर्वजानां च दर्शनम् ॥ १६ ॥ मज्जप्रदोषजाच्छुक्रस्य दोषात्क्लैब्यमहर्षणम् ।