भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 408, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 408

३६० चरकसंहिता [ अ० २९ दूर से ही छोड़ देते हैं। इन लोगों को जो ज़रासा भी आयुर्वेद चिकित्सा का सूत्र मिल जाता है, तो उसीको बेसमय या बिना मतलब के (प्रसंग के बिना ही) बार २ बोलने लगते हैं। ये न तो स्वयं किसी से कुछ पूछते हैं और न यह चाहते हैं कि कोई हमसे पूछे। वे प्रश्न के पूछने से मृत्यु से जैसे डर कर भागते हैं। न तो कोई इनका आचार्य, न कोई शिष्य और न कोई सहाध्यायी होता है ॥ ८ ॥ भिषक्छद्म प्रविश्यैव व्याधितांस्तर्कयन्ति ते । वीतंसमिव संश्रित्य वने शाकुन्तको द्विजान् ॥ ९ ॥ श्रुत-दृष्टि-क्रिया-काल-मात्रा-ज्ञान-बहिष्कृताः । वर्जनीया हि ते मृत्योश्चरन्त्यनुचरा भुवि ॥ १० ॥ वृत्तिहेतोर्भिषङ्मानपूर्णान् मूर्खविशारदान् । वर्जयेदातुरो विद्वान् सर्पांस्ते पीतमारुताः ॥ ११ ॥ ये तु शास्त्रविदो दक्षाः शुचयः कर्मकोविदाः । जितहस्ता जितात्मानस्तेभ्यो नित्यं कृतं नमः ॥ १२ ॥ रोगी को देखकर वैद्य का वेष पहिन कर रोगी के घर में घुस जाते हैं। ये जंगल में पहुंचे चिड़ीमार की तरह पक्षियों को जाल में फंसाने वाले होते हैं। इनको शास्त्रश्रवण, कर्मदर्शन, चिकित्सा और काल, मात्रा शास्त्र का ज्ञान नहीं होता। ये मृत्यु के नौकर होकर पृथ्वी पर विचरते हैं, इसलिये इनको छोड़ देना चाहिये। जीविका प्राप्त करने के लिये वैद्य बने हुए, पूरे मूर्खों को, बुद्धिमान् रोगी छोड़ देवे, क्योंकि वे वायु पिये हुए सांप के समान हैं। जो वैद्य शास्त्रज्ञानी, कर्म में दक्ष, पवित्र, कर्मकुशल, जितहस्त, संयमी, ऐसे प्राणाभिसर वैद्यों को नित्य प्रति नमस्कार है ॥ ९-१२ ॥ तत्र श्लोकाः—दश प्राणायतनिके श्लोकस्थानार्थसंग्रहः । द्विविधा भिषजश्चोक्ताः प्राणस्याऽऽयतनानि च ॥ १३ ॥ इस दश प्राणायतनीय अध्याय में सम्पूर्ण सूत्रस्थान की संक्षिप्त सूची, दो प्रकार के वैद्य, शरीर के दस प्राणायतन ये विषय प्रतिपादन कर दिये हैं ॥१३॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने दशप्राणायतनीयो नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः समाप्तः ॥ २९ ॥