चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 417, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्राप्त यश, कीर्ति, सब लोगों का शरण में आना, अभयप्रदाता होना, आदर सत्कार लोगों से प्राप्त होना, प्रिय विषयों में आरोग्यता का प्राप्त होना यह इसका सर्वोत्तम काम है । इस प्रकार से सब प्रश्नों का पूरा २ उत्तर देदिया ॥२८॥ अथ भिषगादित एव भिषजा प्रष्टव्योऽष्टविधं भवति । तद्यथा-तन्त्रं तन्त्रार्थं स्थानानि स्थानार्थानध्यायानध्यायर्थान् प्रश्नार्थं श्चेति । पृष्टेन चैतद्वक्तव्यमशेषेण वाक्यशो वाक्यार्थशोऽर्थावयवशश्चेति ॥ २९ ॥ वैद्य परीक्षा के लिये वैद्य से आठ प्रश्न पूछे । यथा तन्त्र, तन्त्रार्थ, स्थान स्थानों के अर्थ, अध्याय और अध्याय के अर्थ, प्रश्न और प्रश्नार्थ । पूछे जाने पर वैद्य को सम्पूर्ण रूप से वाक्य, वाक्यार्थ, अर्थावयव रूप से पूर्णतया कहना चाहिये ॥ २९ ॥ तत्राऽऽयुर्वेदः शाखा विद्या सूत्रं ज्ञानं शास्त्रं लक्षणं तन्त्रमित्य- नर्थान्तरम् ॥ ३० ॥ तन्त्रार्थः पुनः स्वलक्षणैरुपदिष्टः, स चार्थः प्रकरणैर्विभाव्यमानो भूय एव शरीर-वृत्ति-हेतु-व्याधि-कर्म-कार्य-काल-कर्तृ-करण-विधि-विनि- श्चयाइशप्रकरणः, तानि च प्रकरणानि केवलेनोपदेक्ष्यन्ते तन्त्रेण ॥३१॥ इसमें आयुर्वेद, शाखा, सूत्र, ज्ञान, शास्त्र, लक्षण व तन्त्र ये सब एकार्थ- वाची शब्द हैं । तन्त्र का अर्थ "आयुर्वेदयतीत्यायुर्वेदः” आयु-जिससे जानी जाती है वह आयुर्वेद-इस प्रकार अपने लक्षणों से कह दिया । हित अहित आयुरूप लक्षण है और यह अर्थ प्रकरण भेद से बहुत प्रकार का है । यथा शरीर (पञ्च महाभूतों का समुदायरूप होने से अवयवादि भेद से बहुत प्रकार का है ), हेतु ( असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग , प्रज्ञापराध, परिणाम ), व्याधि ( धातुवैषम्य ), कर्म ( चिकित्सा ), कार्य ( आरोग्यता ), काल (ऋतु आदि), कर्त्ता ( भिषक् ), करण ( भेषज ), विधि ( उपकल्पना विधान जिसे काल, द्रव्य और व्याधि की अपेक्षा से समझना चाहिये ) । इन प्रकरणों से ग्रन्थ सम्पूर्ण रूप से भली प्रकार सुगठित होता है । ये प्रकरण तन्त्र में सम्पूर्ण रूप से कहे जावेंगे ३०-३१ तन्त्रस्यास्याष्टौ स्थानानि । तद्यथा-श्लोक-निदान-विमान-शारीरे- न्द्रिय-चिकित्सित-कल्पसिद्धि-स्थानानि । तत्र त्रिंशदध्यायकं श्लोकस्थानं अष्टाध्यायकानि निदान-विमान-शारीरस्थानानि, द्वादशकमिन्द्रियाणां, त्रिंशकं चिकित्सितानां द्वादशके कल्पसिद्धिस्थाने इति ॥ ३२ ॥ इस तन्त्र के आठ स्थान हैं यथा-१. सूत्र ( श्लोक ) स्थान, २. निदान- स्थान, ३. विमानस्थान, ४. शारीरस्थान, ५. इन्द्रियस्थान, ६. चिकित्सास्थान,