भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 436

४१८ चरकसंहिता [ अ० १ प्रकार की चिकित्सा की जाती है, क्योंकि ज्वर एक ही प्रकार का है। इस प्रकार से ज्वर के आठ प्रकार कह दिये हैं ॥१४॥ ज्वरस्त्वेक एव संतापलक्षणः। तमेवाभिप्रायविशेषाद् द्विविधमा- चक्षते। निजागन्तुविशेषाच्च । तत्र निजं द्विविधं त्रिविधं चतुर्विधं सप्तविधं चाऽऽहुर्भिषजो वातादिविकल्पात् ॥ १५ ॥ ज्वर तो एक ही प्रकार का है। क्योंकि सब प्रकार के ज्वरों में 'सन्ताप' (गरमी) पाई जाती है। परन्तु अभिप्राय विशेष को लेकर इसके निज (शारीरिक) और आगन्तुज ये दो भेद लिये जाते हैं। इसमें निजज्वर को वातादि दोषों की विकल्पना से (संसृष्ट और असंसृष्ट शीत या उष्णभेद से) दो प्रकार का, (वात आदि दोष भेद से) तीन प्रकार का, (वात, पित्त, कफ और सन्निपातज भेद से) चार प्रकार का, (दोष जन्य, मिश्रण सन्निपात भेद से) सात प्रकार का कहा जाता है ॥१५॥ तस्येमानि पूर्वरूपाणि । तद्यथा—मुखवैरस्यं गुरुगात्रत्वमनन्ना- भिलाषश्चक्षुषोराकुलत्वमस्रागमनं निद्राया आधिक्यमरतिर्जृम्भा विनामो वेपथुः श्रम-भ्रम-प्रलाप-जागरण रोमहर्ष-दन्तहर्षाः शब्द-शीत-वातातपा- सहत्वासहत्वमरोचकाविपाको दौर्बल्यमङ्गमर्दः सदनमल्पप्राणता-दीर्घ- सूत्रताऽऽलस्यमुचितस्य कर्मणो हानिः प्रतीपता स्वकार्येषु गुरूणां वाक्ये- ष्वभ्यसूया, बालेषु प्रद्वेषः, स्वधर्मेष्वचिन्ता माल्यानुलेपन-भोजन-परि- क्लेशनं मधुराेषु भक्ष्येषु प्रद्वेषोऽम्ललवणकटुकप्रियता चेति ज्वरपूर्व- रूपाणि भवन्ति प्राक्सन्तापात्, अपि चैनं सन्तापार्त्तमन्बध्नन्ति ॥ १६ ॥ इत्येतान्येकैकशो ज्वरलिङ्गानि व्याख्यातानि भवन्ति बिस्तरस- मासाभ्याम् । ज्वर के पूर्वरूप—उस ज्वर के पूर्वरूप ये हैं। जैसे-मुख में विरसता, शरीर में भारीपन, भोजन में अनिच्छा, आंखों में बेचैनी, आंखो से आंसू बहना; नींद का अधिक आना, १बेचैनी, जंभाई आना, शरीर का मुड़ना २कम्पन, श्रम, भ्रम, प्रलाप, नींद का न आना, लोमहर्ष, शब्द, गीत, ३ वायु, धूप की कभी सहन करने की रुचि और कभी सहने में अरुचि का होना; भोजन में १. 'असृगागमनम्' इति वा पाठः । अर्थात् आंखे लाल हो जाती हैं। २. 'विराम' इति पाठान्तरम्, अर्थात् मन की उदासीनता । ३. गीत के स्थान पर 'गीत' पाठान्तर है, वहां गीत अर्थात् संगीत में अनिच्छा ।