भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 467, कुल 639 में से

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अ० ५] २६ निदानस्थानम् ४४९ वातादि दोष के अनुसार कुष्ठ—वात आदि तीनों दोष प्रकुपित होकर जब त्वचा, मांस, रक्त और लसीका इन चारों को दूषित करते हैं, तब कुष्ठ- रोग उत्पन्न होता है । इनमें वात की अधिकता से कापालकुष्ठ, पित्त की अधिकता से औदुम्बर-कुष्ठ, कफ की अधिकता से मण्डल-कुष्ठ, वात-पित्त की अधिकता से ऋष्यजिह्व-कुष्ठ, पित्त-कफ की अधिकता से पुण्डरीक-कुष्ठ, कफ- वायु की अधिकता से सिध्म-कुष्ठ होता है और सब दोषो की वृद्धि होने से काकणक-कुष्ठ उत्पन्न होता है । इस प्रकार से सात कुष्ठ उत्पन्न होते हैं । यही सात प्रकार के कुष्ठ प्रकृति के तर-तम अर्थात् न्यूनाधिक भेद के कारण नाना प्रकार के कुष्ठों के असंख्य भेद उत्पन्न कर देते हैं ॥७॥ तत्रे॒दं सर्वकुष्ठनिदानं समासेनोपदेक्ष्यामः । शीतोष्णव्यत्यासमननु- पूर्व्योपसेवमानस्य तथा संतर्पणापतर्पणाभ्यवहार्यव्यत्यासं च, मधु-फा- णित-मत्स्य-मूल-काकमाचीश्च सततमतिमात्रमप्यजीर्णेऽन्ने समश्नतश्चि- लिचिमं च पयसा,हायनक-यवक-चीनकोद्दालक-कोरदूषप्रायाणि चान्नानि क्षीर-दधि-तक्र-कोल-कुलत्थ-माषातसी-कुसुम्भ-परुष-स्नेहवन्ति, एतैरेवा- तिमात्रं सुहितभक्षितस्य च व्यवाय-व्यायाम-संतापानत्युपसेवमानस्य, अतिभयश्रमसंतापोपहतस्य च सहसा शीतोदकमवतरतो, विदग्धं चाऽऽहारजातमनुल्लिख्य विदाहीन्यभ्यवहरतः, छर्दिं च प्रतिघ्नतः, स्नेहांश्चातिचरतो युगपत् त्रयो दोषाः प्रकोपमापद्यन्ते, त्वगादयश्चत्वारः शैथिल्यमापद्यन्ते, तेषु शिथिलेषु त्रयो दोषाः प्रकुपिताः स्थानमभिगम्य संतिष्ठमानास्तानेव त्वगादीन् दूषयन्तः कुष्ठान्यभिनिर्वर्तयन्ति ॥ ८ ॥ कुष्ठ रोग के कारण—अब संक्षेप से सब कुष्ठों का निदान कहते हैं। शीत और उष्ण के परिवर्त्तन से, शीत और उष्ण के परित्याग से (अर्थात् उष्ण सेवन करके सहसा शीत सेवन या इसके विपरीत तथा अनुचित काल में शीतोष्ण सेवन से ), संतर्पण एवं अतर्पण दोनों के उलट फेर से, मधु, फाणित (राब), मछली, मूली, काकमाची (मकोय), इनके निरन्तर या अधिक मात्रा में खाने से, अजीर्ण में भोजन करने से, दूध के साथ चिलचिम-मछली के उपयोग से, हायनक, यवक, चीनक, उद्दालक, कोद्रव आदि कुधान्यों के बहुत खाने से, दूध, दही, छाछ, बेर, कुलथी, उड़द, अलसी, धनिया, इनके तेल में तैयार किये पदार्थों के अतिसेवन से, मैथुन, व्यायाम और सन्ताप के करने से, भय, श्रम और सन्ताप से युक्त होने पर एकदम ठण्डे पानी से (ठण्डी वायु के स्पर्श से भी), विदाहकारक पदार्थों का वमन

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