भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 468, कुल 639 में से

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पृष्ठ 468

४५० चरकसंहिता [ अ० ५

न करके पुनः विदाहकारक पदार्थों के खाने से; वमन के वेग को रोकने से, स्निग्ध पदार्थों के अति भोजन से, तीनों दोष एक साथ में कुपित होजाते हैं, तथा त्वचा, रक्त, मांस और लसीका चारों धातु शिथिल होजाते हैं। इन शिथिल हुए धातुओं में कुपित हुए दोष किसी एक भाग में स्थान पाकर घर कर लेते हैं। वहां पर रहकर त्वचा आदि को दूषित बनाकर कुष्ठरोग उत्पन्न करते हैं ॥८॥ तेषामिमानि खलु पूर्वरूपाणि । तद्यथा—अस्वेदनमतिस्वेदनं पारुष्यमतिश्लक्ष्णता वैवर्ण्यं कण्डूर्निस्तोदः सुप्तता परिदाहः परिहर्षो लोमहर्षः खरत्वमुष्णायनं गौरवं श्वयथुर्विसर्पागमनमभीक्ष्णं कायच्छि- द्रेषूपदेहः पक-दग्ध-दष्ट-क्षतोपस्खलितेष्वतिमात्रं वेदना स्वल्पानामपि च व्रणानां दुष्टिरसंरोहणं चेति कुष्ठपूर्वरूपाणि भवन्ति ॥ ६ ॥ कुष्ठरोग के पूर्वरूप ये हैं—जैसे पसीने का सर्वथा न आना या बहुत पसीना आना, त्वचा में कर्कशता या कठोरता, अथवा बहुत चिकनापन, रंग परिवर्तन, खाज, सुई चुभने की सी वेदना, स्पर्शज्ञान की शून्यता, जलन, रोमांच, हर्ष, रूक्षता, उष्णता, भारीपन, सूजन, वीसर्प रोग का होना, शरीर के छिद्रों में बार बार लेप सा होना, अवरोध, पकने या जलने या कटने या चोट लगने या गिरने पर बहुत दर्द होना, थोड़े से व्रण का भी संक्रान्त होना या शीघ्र न भरना, ये कुष्ठ के पूर्वरूप हैं ॥६॥ तेभ्योऽनन्तरं कुष्ठानि जायन्ते । तेषामिदं वेदना-वर्ण-संस्थान- प्रभाव-नाम-विशेष-विज्ञानं भवति । तद्यथा—रूक्षारुणपरुषाणि विष- मविस्तृतानि खरपर्यन्तानि तनुन्युद्गच्छद्बहिरस्तनूनि सुप्तसुप्तानि हृषितलो- माचितानि निस्तोदबहुळान्यल्पकण्डू-दाह-पूय-लसीकान्याशुगतिसमु- त्थानान्याशुभेदीनि जन्तुमन्ति कृष्णारुणकपालवर्णानि च कापालकुष्ठा- नीति विद्यात् ॥ १० ॥ उनके पीछे कुष्ठ उत्पन्न होते हैं । इसके आगे इनके वेदना, वर्ण, संस्थान, प्रभाव, नाम विशेष वर्णन करते हैं । कापाल-कुष्ठ—रूक्ष, अरुण वर्ण, कर्कश, विषम, फैला, तथा किनारों पर खरखर, बाह्य पार्श्व से पतला तथा थोड़ा उभरा हुआ, पतला, फैला, सोये हुये के समान सोया, बहरा ( स्पर्शज्ञान शून्य ), रोमांच सहित, अतिशय चुभने की वेदनावाले, थोड़ी, खाज, दाह, पूय, लसीका युक्त; शीघ्रता उत्पन्न होनेवाले, शीघ्र फटनेवाले, कीड़ेवाले, काले लाल, कपाल वर्ण के, को 'कापाल कुष्ठ' कहते हैं । कपाल-मिट्टी का ठीकरा, उसके समान ॥ १ ॥