भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 470

४५२ चरकसंहिता [ अ० ५ शुक्लरक्तावभासानि रक्तपर्यन्तानि रक्तराजीसंतवान्युत्सेधवन्ति बहु-बहल-रक्त-पूय-लसीकानि कण्डू-कृमि-दाह-पाकवन्त्याशुगतिसमुत्था- नभेदीनि पुण्डरीकपलाशसंकाशानि पुण्डरीकानीति विद्यात् ॥ १४ ॥ पुण्डरीककुष्ठ—सफेद या लाल रंग की चमक वाले, किनारों पर लाल, लाल रोम (बालों) से व्याप्त, त्वचा से ऊपर उठे हुए न हों, गाढ़ी पूय (पीप), रक्त एवं लसीका बहुत हो, खाज, कृमि, दाह और पाकयुक्त, जल्दी बढ़ने एवं उत्पन्न होने वाले, शीघ्रभेदी, कमल के पत्तों के समान आकारवाले कुष्ठों को 'पुण्डरीक-कुष्ठ' कहते हैं ॥ १४ ॥ परुषारुणविशीर्णबहिस्तनून्यन्तःस्निग्धानि बहून्यल्पवेदनान्थल्प-क- ण्डू-दाह-पूय-लसीकानि लघुसमुत्थानान्यल्पभेदकृमीण्यलाबु-पुष्प-संका- शानि सिध्मकुष्ठानीति विद्यात् ॥ १५ ॥ सिध्मकुष्ठ--जो कुष्ठ बाहर से कठिन, लाल वर्ण, किनारों से कटे-फटे, अन्दर से स्निग्ध, जिनमें सफेद या लाल रंग की चमक हो, जो कि बहुत अधिक हों जिनमें पीड़ा कण्डू, दाह, पूय, लसीका कम हो, जिनकी उत्पत्ति धीरे- धीरे हो, जो अल्पभेदी हों, जिनमें कृमि थोड़े हों और जिनका रंग दूधिया, घीया कद्दू के फूल के समान हो उनको 'सिध्म कुष्ठ' कहते हैं ॥१५॥ काकणन्तिकावर्णान्यादौ पश्चात्सर्व-कुष्ठ-लिङ्ग-समन्वितानि पापीयसा सर्वकुष्ठलिङ्गसंभवेनानेकवर्णानि काकणकानीति विद्यात्, तान्यसा- ध्यानि साध्यानि पुनरितराणि ॥ १६ ॥ काकणक-कुष्ठ—जिन कुष्ठों का रंग प्रथम लाल रत्ती के समान हो और पीछे से उनमें सम्पूर्ण कुष्ठों के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं, उनको 'काकणक कुष्ठ' कहते हैं । (इनमें अनेक रंग उत्पन्न हो जाते हैं, ) ये कुष्ठ पापी मनुष्यों को होते हैं। इनमें सब कुष्ठों के लक्षण होने से अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं ॥ १६ ॥ तत्र यदसाध्यं, तदसाध्यतां नातिवर्तते, साध्यं पुनः किंचित्साध्य- तामतिवर्तते कदाचिदपचारात् । साध्यानीह षट् काकणकवर्ज्यान्य- चिकित्स्यमानान्यपचारतो वा दोषैरभिष्यन्दमानान्यसाध्यतामुपयान्ति १७ साध्य-असाध्य भेद—इन कुष्ठों में से कुछ कुष्ठ साध्य हैं, और कुछ कुष्ठ असाध्य हैं, वे कभी अच्छे नहीं होते। परन्तु जो साध्य हैं, वे अपचार और मिथ्या आहार-विहार के कारण असाध्य होजाते हैं। काकणक-कुष्ठ को छोड़कर शेष छः कुष्ठ भी चिकित्सा के न करने से अथवा दोषों के बढ़ असाध्य होजाते हैं ॥१७॥