भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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करने से वीर्य का क्षय हो जाता है। वीर्य के क्षय होने पर भी जब मन स्त्रीसंग से नहीं हटता और संग करता ही जाता है तब अति प्रचण्ड कामवासना के कारण मैथुन करने पर भी वीर्य उत्पन्न नहीं होता। क्योंकि वीर्य बहुत अधिक क्षीण हो चुका होता है। इस समय सम्भोग रूप परिश्रम करते हुए वायु रक्तवाहिनी धम- नियों में प्रवेश करके इनसे रक्त बहाने लगता है। तब शुक्र (वीर्य) के क्षय से शुक्रमार्ग द्वारा वायु के साथ मिला रक्त बाहर आने लगता है। इस अवस्था में वीर्य के क्षय से तथा रक्त के निकलने से शरीर की सन्धियां शिथिल हो जाती हैं, शरीर में रूक्षता आ जाती है, शरीर और अधिक कमजोर हो जाता है और वायु का प्रकोप हो जाता है। इस प्रकार से प्रकुपित वायु शून्य (अशक्त) शरीर में संचार करता हुआ मांस और रक्त को शुष्क कर देता है, कफ और पित्त को बाहर निकालता है, पाश्र्वों में पीड़ा उत्पन्न करता है, कन्धों को दबा देता है, गले को बिगाड़ देता है, कफ को कुपित करके शिर को कफ से भर देता है, सन्धियों को पीड़ित करके अंगों में वेदना उत्पन्न करता है, पित्त और कफ को कुपित करके अरुचि एवं अपचन उत्पन्न करता है। वायु की प्रतिलोम गति होने से ज्वर, कास, श्वास, स्वरभेद और प्रतिश्याय रोग उत्पन्न हो जाते हैं। इस अवस्था में पुरुष शोषण करने वाले इन उपद्रवों से पीड़ित होकर धीरे धीरे शुष्क हो जाता है। इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि अपने शरीर की रक्षा करता हुआ शुक्र अर्थात् वीर्य की रक्षा करे। यही शुक्र (वीर्य) आहार का सर्वोत्तम फल होता है। आहार का सर्वोत्कृष्ट सार वीर्य है, इसका रक्षण करना परम आवश्यक है। इसका क्षय बहुत से रोगों वा मृत्यु का भी कारण होता है ॥६-१०॥ विषमाशनं शोषस्याऽयतनमिति यदुक्तं, तदनुव्याख्यास्यामः-यदा पुरुषः पानाशनभक्ष्यलेह्योपयोगान् प्रकृति-करण-संयोग-राशि- देश-कालोपयोग-संस्थोपशय-विषमानासेबते, तदा तस्य बातपित्त- श्लेष्माणो वैषम्यमापद्यन्ते, ते विषमाः शरीरमनुसृत्य यदा स्रोतसाम- यनमुखानि प्रतिवार्यावतिष्ठन्ते तदा जन्तुर्यद्यदाहारजातमाहरति तत्त- दस्य मूत्रपुरीषमेवोपजायते भूयिष्ठं नान्यस्तथा शरीरधातुः, स पुरी- षोपष्टम्भाद्वर्तयति, तस्माच्छुष्यतो विशेषेण पुरीषमनुरक्ष्यं, तथा त्यर्थकृशदुर्बलानां, तस्यानाप्याय्यमानस्य विषमाशनोपचिता स्ते पृथगुपद्रवैर्युञ्जन्तो भूयः शरीरमुपशोषयन्ति । तत्र वातः- कण्ठोद्ध्वंसनं पार्श्वशूलनमंसावमर्दनं स्वरभेदं प्रतिश्यायं