चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदो शब्द श्रीचरकसंहिता आयुर्वेद में एक सर्वमान्य पुस्तक है। इसका पठन पाठन आयुर्वेद के विद्यार्थि के लिये अति आवश्यक है। वास्तवमें चरकसंहिता का तथा दूसरे ग्रन्थों का स्पष्टीकरण जितना पढ़ाने में होता है, उतना पढ़ने के समय नहीं होता। यही कारण है कि आयु- र्वेद सम्प्रदाय के मुख्य आचार्य श्री गंगाधर जी कविराज, श्री योगीन्द्र- नाथ सेन जी श्रीचरकसंहिता पर जल्पकल्पतरु और चरकोपस्कार टीकायें लिखकर आयुर्वेद के प्रेमियों का बहुत उपकार किया। इनमें चरकोपस्कारभाष्य तो विद्यार्थियों के लिये बहुत ही उत्तम और लाभ दायक है। पढ़ते समय विद्यार्थी की मनोवृत्ति बहुत ही विचित्र रहती है; खास कर आजकल के आयुर्वेद कॉलेज की जीवन में; जब कि उसको पाश्चात्य विद्या भी सत्तर प्रतिशत सीखनी होती है। ऐसी अवस्था में तो वह उत्तीर्ण होकर उपाधि ही प्राप्त करने का इच्छुक रहता है। इसमें कोई दो चार अपवाद भी होते हैं। यह वृत्ति हमारे यहां ही हो-यह बात नहीं; पाश्चात्य देशों में भी इसका-मनुष्य धर्म के स्वभाव के अनुसार परिचय मिलता है। इसके लिये संक्षिप्त प्रकाशन, या सारांश रूप में पुस्तकें छोटी-छोटी प्रकाशित की जाती हैं। यह पुस्तकें सस्ती, छोटी तथा आवश्यक सब विषयों से पूर्ण रहती हैं। इनमें विद्यार्थी को जहाँ आर्थिक भार से बचत होती है वहाँ श्रेणी में सुना सब विषय समझने में सरलता रहती है। इसी कारण से या अन्य कारणों से बंगला में, मराठी में या तेलगु में जो भी अनुवाद चरकसंहिता या दूसरे आयुर्वेद ग्रन्थोंके हुए हैं, वे सस्ते, तथा मूल के साथ साथ अनुवाद रूप में ही हैं। उनको स्पष्ट करने के लिये किसी भी अर्वाचीन रूप की सहायता नहीं ली गई और इन ग्रन्थों के पढ़ने से सफल वैद्य बने हैं, ऐसा हमारे देखने में भी है। मेरी अपनी मान्यता यह है कि आयुर्वेद के विचारों को आयुर्वेद के ही दृष्टि कोण से देखा या समझा जा सकता है; और इन्हीं के दृष्टि कोण से देखने और समझने की कोशिश करनी चाहिये। इस अर्वाचीन चिकित्साशास्त्र से हमारे शास्त्र का समन्वय सिद्धान्तों में हो ही नहीं सकता। दोनों पद्धतियां भिन्न हैं, और भिन्न रहेंगी यह कोई आवश्यक नहीं कि दोनों को एक किया जाय। होम्योपैथ अपनी पद्धति का ऐलोपैथी के साथ गोट-जोड़ा नहीं करता। 'आयुर्वेद'