भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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५७६ चरकसंहिता [ अ० ८ अर्थात् योग के अनुकूल होना वा विपरीत भी होना सम्भव है, इस प्रकार एकान्त निश्चय न होना 'सव्यभिचार'* है ॥ ४५ ॥ अथ जिज्ञासा—जिज्ञासा नाम परीक्षा; यथा भेषजपरीक्षोत्तर- कालमुपदेक्ष्यते ॥ ४६ ॥ जिज्ञासा—प्रमाणों द्वारा अर्थ की परीक्षा करना 'जिज्ञासा' है। यथा भेषज परीक्षा जो आगे कहेंगे ॥ ४६ ॥ अथ व्यवसायः—व्यवसायो नाम निश्चयः, यथा वातिक एवायं व्याधिः, इदमेवास्य भेषजमिति ॥ ४७ ॥ व्यवसाय—निश्चय का नाम 'व्यवसाय' है। यथा—यह रोग वातजन्य ही है, और इस रोग की यही औषध है ॥ ४७ ॥ अथार्थप्राप्तिः-अर्थप्राप्तिर्नाम यत्रैकेनार्थेनोक्तेनापरस्यार्थस्यानुक्तस्य सिद्धिः; यथा-नायं संतर्पणसाध्यो व्याधिरित्युक्ते भवत्यर्थप्राप्तिः—अप- तर्पणसाध्योऽयमिति, नानेन दिवा भोक्तव्यमित्युक्ते भवत्यर्थप्राप्तिः— निशि भोक्तव्यमिति ॥ ४८ ॥ अर्थप्राप्ति—एक कहे हुए अर्थ से दूसरे न कहे हुए अर्थ का जिससे ज्ञान होजाय उसका नाम अर्थप्राप्ति है। यथा यह रोग संतर्पणसाध्य नहीं है, यह कहने पर पता लग जाता है कि यह रोग अपतर्पण साध्य है। इसको दिन में भोजन नहीं देना चाहिये, ऐसा कहने पर ज्ञात हो जाता है कि रात्रि में भोजन देना चाहिये ॥ ४८ ॥ अथ संभवः—संभवो नाम यो यतः संभवति स तस्य संभवः; यथा-षड् धातवो गर्भस्य, व्याधेरहितं हितमारोग्यस्येति ॥ ४९ ॥ संभव—जो जिससे उत्पन्न होता है, वह उसका संभव अर्थात् कारण है। जैसे छः धातु (पृथिवी, अप, तेज, वायु, आकाश और चेतना) गर्भ की उत्पत्ति में कारण हैं। इसी प्रकार अहित-सेवन रोगों की उत्पत्ति में, हित-सेवन आरोग्यता की उत्पत्ति में कारण हैं ॥ ४९ ॥ अथानुयोज्यं—अनुयोज्यं नाम यद्वाक्यं वाक्यदोषयुक्तं तदनुयो- ज्यमुच्यते,सामान्येनाहृतेष्वर्थेषु वा विशेषग्रहणार्थं यद्वाक्यं तदनुयोज्यं; ॐ न्यायदर्शन में सव्यभिचार को हेत्वाभास माना है। यह हेतु नहीं, परन्तु हेतु के समान दीखता है। यथा—'सव्यभिचार-विरुद्ध-प्रकरणसम-साध्यस- मातीतकाला हेत्वाभासाः' । न्याय० १ । २ । ४५ ॥