भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 608

५६० चरकसंहिता [ अ० ८

भूमि परीक्षा कह दी । औषधि परिज्ञान के लिये भूमिपरीक्षा कल्पस्थान ( मदन- फल-कल्प ) में कहेगे ॥९४॥ आतुरस्तु खलु कार्यदेशः, तस्य परीक्षा आयुषः प्रमाणज्ञानहेतोर्वा स्याद्बलदोषप्रमाणज्ञानहेतोर्वा; तत्र तावदियं बलदोषप्रमाणज्ञानहेतोः— दोषप्रमाणानुरूपो हि भेषजप्रमाणविकल्पो बलप्रमाणविशेषापेक्षो भवति । सहसा ह्यतिबलमौषधमपरीक्षकप्रयुक्तमल्पबलमातुरमभिघात- येत्, न ह्यविबलान्याग्नेय-सौम्य-वायवीयान्यौषधान्यग्निक्षारशस्त्रकर्माणि वा शक्यन्तेऽल्पबलैः सोढुम् । अविषह्याति तीक्ष्णवेगत्वद्धि सद्यः प्राण- हराणि स्युः । एतच्चैव कारणमपेक्षमाणा हीनबलमातुरमविषादकरै- मृदुसुकुमारप्रायैरुत्तरोत्तरगुरुभिरविभ्रमैरनात्ययिकैश्चोपचरन्त्यौषधैः , विशेषतश्च नारीः । ता ह्यनवस्थितमृदुविवृत्तविकलहृदयाः प्रायः सुकुमार्योऽबलाः परसंस्तभ्याश्च । तथा बलवति बलवद्व्याधिपरिगते स्वल्पबलमौषधमपरीक्षकप्रयुक्तमसाधकं भवति ॥ ९५ ॥ कार्यदेश — धातुसाम्य कार्य का देश अर्थात् आधार रोगी है । इस की परीक्षा आयु के प्रमाण ज्ञान के लिये है । अथवा रोगी के बल और दोष को जानने के लिये रोगी रूपी देश की परीक्षा होती है । रोगी की बल-प्रमाण और दोष-प्रमाण की परीक्षा का प्रयोजन — औषधि का प्रमाण दोष और बल रोग और रोगी दोनों को देख कर निश्चित किया जाता है । क्योकि यदि बहुत बलवती औषध थोड़े बल वाले रोगी को बिना परीक्षा किये दे दी जाय तो यह औषध रोगी को मार देगी । क्योकि अल्प बल वाले व्यक्ति, अति बल वाली, आग्नेय, वायवीय गुण से युक्त ओषधियों को और अग्नि, क्षार और शस्त्र के कर्मों को सहन नहीं कर सकते†। इनका वेग असह्य और अतितीक्ष्ण होने से ये वस्तुएं शीघ्र प्राणनाशक हो जाती हैं । इन कारणों को देख कर ही हीनबल वाले रोगी की, खास कर स्त्री की चिकित्सा शरीर और मन में ग्लानि उत्पन्न न करने वाली, मृदु-कोमल ओषधियों से तथा धीरे धीरे, उत्तरोत्तर वीर्य और परिमाण में गुरु होते हुए भी व्यापत्ति ( विकार ) न करने वाली, सम्यक् प्रकार से दी हुई ओषधियों से करते हैं । ये स्त्रियां अस्थिर, छोटे दिल की तथा भीरु हृदय वाली, प्रायः सुकुमार, अबला होती हैं और थोड़ी सी भी वेदना को सहन नहीं कर सकतीं और स्वयं अपने को कष्ट में नहीं संभाल सकतीं, उनको दूसरे ही को संभालना पड़ता है ।

†देखिये सुश्रुत, सूत्रस्थान में क्षार और अग्निकर्म ।