भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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६१० चरकसंहिता [ अ० ८

पनमेकरसमित्याचक्षते भिषजस्तद् दुर्लभतमं, संसृष्टरसभूयिष्ठत्वाद् द्रव्याणाम्। तस्मान्मधुराणि च मधुरप्रायाणि च मधुरविपाकानि च मधुरप्रभावाणि च मधुरस्कन्धे मधुराण्येव कृत्वोपदेक्ष्यन्ते तथेतराणि द्रव्याण्यपि। तद्यथा—जीवकर्षभकौ जीवन्ती-वीरातामलकी-काकोली- क्षीरकाकोळी-भीरु-मुद्गपर्णी-माषपर्णी-शालपर्णी-पृश्निपर्ण्यसनपर्णी-मेदा- महामेदा-शृङ्ग-कर्कट-शृङ्गी-शृङ्गाटिका-छिन्नरुहा-छत्रत्रातिच्छत्रा-श्रावणी- महाश्रावण्यलम्बुषा - सहदेवा - विश्वदेवा - शुकाक्षीर-शुक्राबळातिबला- विदारी-क्षीर-विदारी-क्षुद्रसह-महासहार्ष्यगन्धाइवगन्ध-पयस्या-वृश्चीर- पुनर्नवा-बृहती-कण्टकारिकैरण्ड-मोरट-श्वदंष्ट्रा-संहर्षा-शतावरी-शतपुष्पा- मधुकपुष्पी-यष्टिमधु-मधूलिका-मृद्वीका-खर्जूर-परूषकरात्मगुप्ता-पुष्करबीज- कशेरुका-राजादन-कतक-काश्मर्य-शीतपाक्यौदन-पाकीताऊ-खर्जूर-मस्त केक्ष्विक्षुबालिका-दर्भ-कुश-कास-शालि - गुन्द्रेकटंक-शरमूल-राजक्षवक- र्व्यप्रोक्ता - द्वारदा-भारद्वाजी-वनत्रपुष्य - भीरुपत्नी-हंसपादी-काकनासा- कुलिङ्गा-क्षीरवल्ली-कपोतवल्ली-गोपवल्लो-मधुवल्लयाः सोमवल्ली चेति। छः रस होने पर भी इनके परस्पर मिलने से बहुत विस्तार हो जाता है, जिससे कि ये असंख्य बन जाते हैं। एक दूसरे में मिले रसों के अंशांश बल की विकल्पना से असंख्य भेद हो जाते हैं। इसलिये आस्थापन द्रव्यों के उदाहरण मात्र के लिये मधुर आदि छः प्रकार के रसों में एक एक का विभाग करके नाम मात्र से कहेंगे। बुद्धिमान् मनुष्य न कहे हुए द्रव्यों को भी समझ सकेंगे। अतः रस के अनुसार छः प्रकार विभाग करके नाम और लक्षण दर्शाने के लिये छः आस्थापन स्कन्धों को समूह रसों के अनुसार विभाग करके कहेंगे। वैद्य लोग छः प्रकार के आस्थापन स्कन्ध को शुद्ध एक रस वाला कहते हैं। यह बात अतिदुर्लभ है। क्योंकि द्रव्यों में एक अनेक रसों का परस्पर संसर्ग रहता है। इसलिये जो द्रव्य मधुर रस (प्रायः करके) बहुल मधुर विपाक और मधुर प्रभाव वाले (अचिन्त्य शक्ति वाले) हैं, उनके रसान्तर होने पर भी मधुर रस की प्रधानता होने से मधुर समझकर इस मधुर स्कन्ध में ही उपदेश करेंगे। इसी प्रकार अम्ल आदि द्रव्यों की भी व्याख्या करेंगे। यथा-जीवक, ऋषभक, जीवन्ती, वीरा (शतावरी), तामलकी (भूष्या- मलकी), काकोली, क्षीरकाकोली, भीरु (सहस्त्रवीर्या, शतावरी का भेद), मूँगपर्णी, माषपर्णी, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, शणपर्णी मेदा, महामेदा, देवदारु, काकड़ाशृङ्गी, छिंघाड़ा, छिन्नरुहा, (गिलोय) छत्रा, तालमखाना, अहिच्छत्रा