चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 75, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ४ । सूत्रस्थानम् ५१ पद्म (कमल), उत्पल (नीला कमल), नलिन, कुमुद, सौगन्धिक (कमल का एक भेद), पुण्डरीक (श्वेत कमल), शतपत्र, मधुक (मुलैहटी), प्रियंगु (फूल प्रियंगु) धातकी पुष्प (धाय के फूल) ये दस 'मूत्र-विरजनीय' अर्थात् मूत्र में रंग लाते हैं, और दूषित रंग को प्राकृत रूप में लाते हैं ।। वृक्षादनी-श्वदंष्ट्रा-वसुक-वशिर-पाषाणभेद-दर्भ-कुश-काश-गुन्द्रेत्कट- मूलानीति दशेमानि मूत्रविरेचनीयानि भवन्ति ॥ (३५) ॥ इति पञ्चकः कषायवर्गः ॥ [७] ॥ वृक्षादनी (बन्दार्क), श्वदंष्ट्रा (गोखरू), वसुक (पुनर्नवा), वशिर (चिरचिटा), पाषाणभेद, दर्भमूलानि (दाभ), कुश (कुशा), काश (सरकन्डा), गुन्द्रा (दोगला), इत्कट (ईकड़ी), इत्कट का मूल 'मूत्र-विरेचनीय' अर्थात् मूत्र बढ़ाने वाले हैं। यह पांच से बना कषाय वर्ग है । द्राक्षाभयामलक-पिप्पली-दुरालभा-शृङ्गी-कण्टकारिका-वृश्चीर-पुनर्न- वा-तामलक्य इति दशेमानि कासहराणि भवन्ति ॥ (३६) ॥ द्राक्षा (किशमिश), अभया (जंगी हरड़), आमलक (आंवला), पिप्पली, दुरालभा (धमासा), शृङ्गी (काकड़ासिंगी), कण्टकारिका (छोटी कटेरी), वृश्चीर (श्वेत पुनर्नवा), पुनर्नवा (रक्त पुनर्नवा), तामलकी, (भूई आंवला) ये दस 'कासहर' अर्थात् खांसी को शान्त करते हैं ॥ शटी-पुष्करमूलाम्लवेतसैला-हिङ्ग्वगुरु-सुरसा-तामलकी-जीवन्ती- चण्डा इति दशेमानि श्वासहराणि भवन्ति ॥ (३७) शटी (कचूर), पुष्करमूल (पोहकरमूल), अम्लवेतस, एला (छोटी इला- यची), हिंगु (हींग), अगुरु (अगर), सुरसा (तुलसी), तामलकी (भूम्यामलकी), जीवन्ती, चण्डा (चोख) ये दस 'श्वासहर' अर्थात् श्वास रोग के नाशक हैं ॥ पाटलाग्निमन्थ-बिल्व-श्योनाक-काश्मर्य-कण्टकारिका-बृहती-शालप- र्णी-पृश्निपर्णी-गोक्षुरका इति दशेमानि शोथहराणि भवन्ति ॥ (३८) ॥ पाटला (पाढ़ल), अग्निमन्थ (अरणी), बिल्व (बेलगिरी), श्योनाक (टेंटु), काश्मर्य (गम्भारी), कण्टकारिका (छोटी कटेरी), बृहती (बड़ी कटेरी), शालपर्णी, पृश्निपर्णी, गोक्षुरक (गोखरू), ये दस 'शोथहर' अर्थात् सूजन कम करते हैं ॥