भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० ५ ] ५ सूत्रस्थानम् ६५ सम्बन्धी ज्ञान करना व्यर्थ है ? ऐसा नहीं, क्योंकि द्रव्यों का गुरु या लघु होना भी अकारण या निष्प्रयोजन नहीं है । वायु और अग्नि के गुणों की अधिकता वाले पदार्थ लघुगुण वाले होते हैं [ आकाश गुण वाले बहुतसे द्रव्य लघु होते हुए भी अग्नि का बढ़ाने वाले नहीं होते, इसलिए इनका ग्रहण नहीं किया ] । पृथ्वी, सोम ( जल ) गुणों की अधिकता वाले पदार्थ गुरु होते हैं । इसलिये लघु पदार्थ वायु एवं अग्नि से बने होने के कारण; और अपने गुणों के कारण से—जैसे वायु रूक्ष लघु, सूक्ष्म, चल, विशद, खर गुण वाला है, इससे भी लघु पदार्थ जाठराग्नि का संदीपन करने वाले एवं तृप्ति पूर्वक मात्रा का व्यतिक्रम करके खाने पर भी थोड़े दोष वाले होते हैं; ये अधिक दोष नहीं करते १ । गुरु द्रव्य अग्नि को संदीपन करने वाले नहीं होते । क्योंकि असमान होने से अग्नि से विपरीत गुण वाले हैं अर्थात् पृथ्वी और जल के गुण वाले होते हैं । अतः तृप्तिपूर्वक पेट भर के खाने से बहुत अधिक दोष कारक होते हैं । व्यायाम अग्निवल और हेमन्त ऋतु आदि में स्वभावतः अग्नि वृद्धि होने के कारण ये विकार नहीं करते; अन्य अवस्थाओं में विकार उत्पन्न करते हैं २ । इसलिये 'मात्रा' अग्नि बल की अपेक्षा करती है गुरु लघु द्रव्य की अपेक्षा नहीं करती ॥५॥ न च नापेक्षते द्रव्यम् । द्रव्यापेक्षया च त्रिभागसौहित्यमर्धसौहित्यं वा गुरूणामुपदिश्यते; लघूनामपि च नातिसौहित्यमग्नेर्युक्त्यर्थम् । मात्रा द्रव्य की अपेक्षा नहीं करती, ऐसा भी नहीं क्योंकि मात्रा की अपेक्षा से गुरु द्रव्यों का तीन हिस्सा या आधे पेट, जिससे कि कुक्षि मे प्रपीड़न, भारी- पन प्रतीत न हो, इतना खाना बताया है । परिमाण या मात्रा से नहीं बताया । इसी प्रकार लघु गुण वाले पदार्थों का भी पेट भर के खाने का आदेश नहीं १. अग्नि भी रूक्ष, लघु, सूक्ष्म चल, विशद, खर है, इसलिये इस गुणवाले पदार्थ अग्नि को बढ़ायेंगे । समान गुण वाले समान गुणों को बढ़ाते हैं । अतः अधिक मात्रा में खाने पर भी लघु पदार्थ अग्नि को बढ़ायेंगे ही । २. व्यायाम करने वाले मनुष्य को विरुद्ध वा अविरुद्ध सब प्रकार का भोजन पच जाता है । क्योंकि व्यायाम से अग्नि बढ़ती है । हेमन्त में अग्नि स्वभावतः प्रबल होती है, अतः गुरु पदार्थ खाने का आदेश दिया है ।