भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 639 में से

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पृष्ठ 88

७० चरकसंहिता [अ० ५ शिर में अवरुद्ध कफ को निकालने के लिये स्वस्थ पुरुष के लिये वैरेच- निक धूम— श्वेता ज्योतिष्मती चैव हरितालं मनःशिला ॥ २४ ॥ गन्धाश्चागुरुपत्राद्या धूमः शीर्षविरेचनम् । श्वेता ( अपराजिता ), ज्योतिष्मती ( माल कंगनी ), हरिताल ( हरताल ), मनःशिला ( मैनसिल ), 'गन्ध अगुरु पत्रादि' ( ज्वर चिकित्सा में 'अगुरुआदि तेल' में कहे हुए अगरू, कुष्ठ, तगर, पत्रज आदि [ इनमें कुष्ठ और तगर को छोड़कर अन्य] द्रव्य लेकर पीसकर पूर्व की भांति बत्ती बना कर पीना चाहिये । यह धूम शिरोविरेचन के लिये वैरेचनिक धूम है ॥ २४ ॥ धूमपान के गुण— गौरवं शिरसः शूलं पीनसार्धावभेदकौ ॥ २५ ॥ कर्णाक्षिशूलं कासश्च हिक्काश्वासौ गलग्रहः । दन्तदौर्बल्यमास्रावः श्रोत्रघ्राणाक्षिदोषजः ॥ २६ ॥ पूतिघ्राणास्यगन्धश्च दन्तशूलमरोचकः । हनुमन्याग्रहः कण्डूः क्रिमयः पाण्डुता मुखे ॥ २७ ॥ श्लेष्मप्रसेको वैस्वर्यं गलशुण्ड्युपजिह्विका । खालित्यं पिञ्जरत्वं च केशानां पतनं तथा ॥ २८ ॥ क्षवथुश्चातितन्द्रा च बुद्धेर्मोहोऽतिनिद्रता । धूमपानात्प्रशाम्यन्ति बलं भवति चाधिकम् ॥ २९ ॥ शिरोरुहकपालानामिन्द्रियाणां स्वरस्य च । न च वातकफात्मानो बलिनोऽप्यूर्ध्वजत्रुजाः ॥ ३० ॥ धूमवक्त्रकपानस्य व्याधयः स्युः शिरोगताः । ( गौरव ) शिर का भारीपन, शिर का दुखना, शिरोवेदना ( पीनस ) नाक की श्लैष्मिक कला का सूजन, ( अर्द्धावभेदक ) आधा-सीसी, ( कर्णशूल ) कान की पीड़ा, ( अक्षिशूल ) आंख का दुःखना, ( कास ) खांसी, ( हिक्का ) हिचकी, ( श्वास ) दमा, ( गलग्रह ) स्वर भंग, ( दन्तदौर्बल्य ) दान्तों की निर्बलता, ( आस्राव ) कान नाक और आंख के रोग स्राव का आना, ( पूतिघ्राण ) नाक से दुर्गन्ध आना, ( आस्यगन्ध ) मुख की बदबू, ( दन्तशूल ) दाँत की पीड़ा, ( अरोचक ) भोजन में अरुचि, अनिच्छा, ( हनुग्रह ) जबाड़ी भिंचना, (मन्या- ग्रह ) गर्दन का जकड़ जाना, इधर-उधर न हिलना, ( कण्डू ) खाज, कृमि, ( मुखपाण्डुता ) चेहरे का पीलापन, ( श्लेष्मप्रसेक ) मुख से पानी का बहना