भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० ५ ] सूत्रस्थानम् ७१ अर्थात् लाला स्राव, (वैस्वर्य्य) स्वर का साफ न होना गलशुण्डी, उपजिह्विका (खालित्य) बालों का गिरना, (पिंजरत्व) बालों का धूसर रंग होना, (केशप- तन) बालों का झड़ जाना, (क्षवथु) छींक आना, (अतितन्द्रा) आलस्य की अधिकता, (बुद्धिमोह) बुद्धिका जड बनना मूर्च्छा, (अतिनिद्रता) नींदका अधिक आना ये रोग धूम्र पीने से अच्छे होते हैं और बाल, शिर की अस्थि, आँख कान आदि इन्द्रियों का, स्वर, और गले का बल अधिक होता है । बलवान् कारण से भी वात कफ से उत्पन्न गले से ऊपर होने वाले आँख, कान, नाक, मुख, गले के रोग खास कर शिर सम्बन्धी रोग मुख से धूम्रपान करने वाले व्यक्ति को नहीं होते । मुख से धुंआ लेकर नाक से निकाल देना चाहिये ॥ २५-३० ॥ धूम्रपान के आठ काल— प्रयोगपाने तस्याष्टौ कालाः संपरिकीर्तिताः ॥ ३१ ॥ वात-श्लेष्म-समुत्क्लेशः कालेष्वेपु हि लक्ष्यते । स्नात्वा भुक्त्वा समुल्लिख्य क्षुत्त्वा दन्तान्निघृष्य च ॥ ३२ ॥ नावनाञ्जननिद्रान्ते चात्मवान् धूमपो भवेत् । तथा वातकफात्मानो न भवन्त्यूर्ध्वजत्रुजाः ॥ ३३ ॥ रोगास्तस्य तु पेयाः स्युरापानास्त्रिस्त्रयस्त्रयः । प्रायोगिक धूम्र के मुख से पीने के आठ समय ब्रह्मा आदि ने कहे हैं, क्योंकि इन आठ समयों में वात और कफ का प्रकोप देखा जाता है अन्य समयों में इतना कोप नहीं दिखाई देता । स्नान करके, भोजन करके, वमन करके, छींकें लेकर दांत जीभ साफ करके नाक से नस्य लेकर, आंख में अंजन करके, सो के उठकर, प्रसन्न मन हो तब धूम्र को पीना चाहिये । इसी प्रकार से वातजन्य और कफजन्य, ग्रीवा से ऊपर के रोग नहीं होते हैं । शीत गुण के कारण यदि वायु प्रकुपित हुई है, तो वातजन्य रोग होते हैं । ऐसी अवस्था में स्नैहिक धूम लेना चाहिये । जब पुरुष रूक्ष हो, रूक्ष हर 'स्नैहिक धूम' पीना चाहिये । कफ जन्य रोग तब होते हैं, जब कि पुरुष में स्निग्धता (रूक्षता का अभाव) होता है । इसलिये कफ के नाश के लिये 'वैरेचनिक धूम' लेना चाहिये । तीन प्रकार के धूम्रपान की घूंटों की सीमा ६ (नौ) है । अर्थात् धूम्र पीने के समय में किसी भी प्रकार का धूम्र ६ घूंट से अधिक नहीं पीना चाहिये ॥ ३१-३३ ॥