भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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७८ चरकसंहिता [ अ० ५ यह (दो तोला तैल) तीन तीन दिन के पीछे नस्य करे। अर्थात् यदि आज नस्य लिया है, तो तीन दिन छोड़कर पांचवें दिन नस्य ले। इस प्रकार से प्रत्येक ऋतु में कुल सात दिन तक लेना चाहिये। सप्ताह में लगभग दो वार नस्य ले। इस तैल का नस्य लेने वाला व्यक्ति वायु के झोंके में, खुली वायु में न रहे, शरीर को गरम बनाये रक्खे, पथ्याशी, जितेन्द्रिय, ब्रह्मचारी, संयमी रहे। यह तैल वात, पित्त कफ तीनों दोषों का नाश करने वाला और आंख, कान, नाक आदि इन्द्रियों को बल देने वाला है। जो व्यक्ति इस अणु तैल को समय ३ पर विधिपूर्वक प्रयोग करता है उसे ऊपर लिखे हुए गुण मिलते हैं ॥ ६६-६८ ॥ दन्त धावन की विधि— आपोथिताग्रं द्वौ कालौ कषायकटुतिक्तकम् ॥ ६६ ॥ भक्षयेद्दन्तपवनं दन्तमांसान्यबाधयन्। कसैले, कटु (कडुवे) नीम आदि, तिक्त (तीखे) तेजबल, जीयापोता आदि, रसयुक्त दातुन को आगे से चबाकर कूट कर अर्थात् नरम बनाकर, मसूड़ों को नुक्सान न पहुँचाते हुए, प्रातःकाल बिस्तर से उठ कर और सायंकाल सोने के समय दांत साफ करे ॥ ६६ ॥ दातुन करने से लाभ— निहन्ति गन्धवैरस्यं जिह्वादन्तास्यजं मलम् ॥ ७० ॥ निष्कृष्य रुचिमाधत्ते सद्यो दन्तविशोधनम्। दातुन दुर्गन्ध को, बुरे स्वाद को, जीभ दांत और मुख के मल, और मुख के दुर्गन्ध को नष्ट करती है। दांतों को साफ करने से मुख में रुचि प्रसन्नता अथवा भोजन में रुचि उत्पन्न होती है ॥ ७० ॥ जीभ को साफ करने की विधि— सुवर्णरूप्यताम्राणि त्रपुरीतिमयानि च ॥ ७१ ॥ जिह्वा-निर्लेखनानि स्युरतीक्ष्णान्यनृजूनि च। जिह्वा-मूल-गतं यच्च मलमुच्छ्वासरोधि च ॥ ७२ ॥ दौर्गन्ध्यं भजते तेन तस्माज्जिह्वां विनिर्लिखेत्। जीभ को निर्लेखन अर्थात् खुरेंच करके साफ करनेके लिए सोना, चाँदी, ताम्बा, राँगा, जस्ता, पीतल और लोह इनकी बनी जीभी अतीक्ष्ण, जो तेज धारवाली न हो, टेढ़ी मुड़ी हुई होनी चाहिये। जो मल जिह्वा के पिछले भाग में लगा हुआ हो और जो मल श्वास को रोकता हो या दूषित करता हो उसको इससे खुरेंचकर निकाल देना चाहिये ॥ ७१-७२ ॥