भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० ५ ] सूत्रस्थानम् ७९ दातुन के लिये उत्तम वृक्ष— करञ्ज-करवीरार्क-मालती-ककुभासनाः ॥ ७३ ॥ शस्यन्ते दन्तपवने ये चाप्येवंविधा द्रुमाः । धार्याण्यास्येन वैशद्य-रुचि-सौगन्ध्यमिच्छता ॥ ७४ ॥ जाती-कटुक-पूगानां लवङ्गस्य फलानि च । कङ्कोलफलं पत्रं ताम्बूलस्य शुभं तथा ॥ ७५ ॥ तथा कर्पूर-निर्यासः सूक्ष्मैलायाः फलानि च । करञ्ज ( नाटा करञ्ज ), करवीर (कनेर), अर्क ( आक ), मालती (जुही), ककुभ ( अर्जुन ), असन ( आसन ), ये वृक्ष अथवा इनके समान इस गुण वाले वृक्ष दातुन के लिये उत्तम हैं । मुख की निर्मलता, भोजन में रुचि एवं मुख की सुगन्धि चाहने वाले पुरुष को चाहिये कि जातिफल ( जायफल ), कटुकफल ( लता कस्तूरी ), पूग ( सुपारी ), लवङ्ग (लौङ्ग), कङ्कोल (शीतल चीनी), उत्तम पान, कपूर ( कपूर वृक्ष का गोंद) और छोटी इलायची इन वस्तुओं को मुख में धारण करे ॥७५॥ स्नेह-गण्डूष के गुण— हन्वोर्बलं स्वरबलं वदनोपचयः परः ॥ ७६ ॥ स्यात्परं च रसज्ञानमन्ने च रुचिरुत्तमा । न चाऽस्य-कण्ठ-शोषः स्यान्नौष्ठयोः स्फुटनाद्भयम् ॥ ७७ ॥ न च दन्ताः क्षयं यान्ति दृढमूला भवन्ति च । न शूल्यन्ते न चाम्लेन हृष्यन्ते भक्षयन्ति च ॥ ७८ ॥ परानपि खरान् भक्ष्यान् तैल-गण्डूष-सेवनात् । जबड़ों को बल मिलता है, वाणी, स्वर, आवाज को बल प्राप्त होता है, मुख, गाल आदि की वृद्धि, उन्नति, रसों का ज्ञान भली प्रकार से होता है और अन्न में भली प्रकार से भोजन के लिये रुचि होती है । स्नेह-गण्डूष अर्थात् तैल के गरारे करने वाले को गले में खुश्की, रूक्षता नहीं होती और न ओठों के फटने की आशङ्का होती है । दाँत जल्दी गिरते भी नहीं, अपितु और भी अधिक जड़ें मजबूत बन जाती हैं और न दाँतों में दर्द होती है, और न खटाई से खट्टे होते हैं, कठोर खाने की वस्तु को भी खा सकते हैं ॥ ७६-७८ ॥ शिर पर तैल लगाने से लाभ— नित्यं स्नेहार्द्रशिरसः शिरःशूलं न जायते ॥ ७९ ॥ न खालित्यं न पालित्यं न केशाः प्रपतन्ति च ।

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