भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० ५ ] ६ सूत्रस्थानम् ८१ ( त्वचा, चमड़ी ) अच्छी कोमल हो जाती है । वायु के रोग शान्त हो जाते हैं, और शरीर क्लेश कष्ट दुःख आदि, व्यायाम-परिश्रम सहन करने योग्य बन जाता है । अन्य श्रोत्रादि इन्द्रियों की अपेक्षा त्वचा में वायु का आधिक्य रहता है और स्पर्श ज्ञान भी त्वचा में ही आश्रित है, इसलिये अभ्यंग ( तैल का मलना ) त्वचा के लिये अति उपकारी है । इस लिये मनुष्य को चाहिए कि उसे करता रहे। तैल मर्दन करने वाले व्यक्ति के शरीर पर अभिघात ( चोट ) लगने पर भी विशेष कोई हानि नहीं आती; क्योंकि वायु शान्त हुई होती है, आघात जो कि वायु को कुपित करने वाला है वह भी वायु को कुपित नहीं कर सकता । इसी प्रकार कभी अचानक श्रम या मेहनत का काम करने से भी शरीर में विकार उत्पन्न नहीं होता । नित्य प्रति अभ्यंग ( शरीर पर तैल मर्दन करने से ) मनुष्य की त्वचा कोमल, उत्तम स्पर्शज्ञान वाली, तथा पुष्ट भरे हुए सुघटित अंगों वाला बलवान् एवं सुन्दर शरीर वाला हो जाता है । ऐसे मनुष्य को बुढ़ापा भी जल्दी नहीं आता ॥ ८३-८७ ॥ पाँव में तैलमर्दन के गुण— खरत्वं शुष्कता रौक्ष्यं श्रमः सुप्तिश्च पादयोः ॥ ८८ ॥ सद्य एवापशाम्यन्ति पादाभ्यङ्ग-निषेवणात् । जायते सौकुमार्यं च बलं स्थैर्यं च पादयोः ॥ ८९ ॥ दृष्टिः प्रसादं लभते मारुतश्चापशाम्यति । न च स्युर्गृध्रसी-वाताः पादयोः स्फुटनं न च ॥ ९० ॥ न शिरा-स्नायु-संकोचः पादाभ्यङ्गेन पादयोः । पाँव में ( खासकर पाँव के तन्तुओं पर तैल लगाने से खरत्व ( खुखुरा पन ), शुष्कता ( सूखापन, फटना ), रौक्ष्य ( रूक्षता, रूखाई ), श्रम ( थकान ) और पांव की सुप्ति ( सो जाना, स्तब्ध, जड़ सा हो जाना ), शीघ्र ही अच्छे हो जाते हैं । पाँव में तेल मर्दन करने से पांव में कोमलता, सुकुमारता आ जाती है, पांव बलवान् , स्थिर ( न कांपने वाले ) हो जाते हैं । इसके सिवाय आंख स्वच्छ, निर्मल हो जाती है, और वायु भी पांव की शान्त हो जाती है । पांव में तैल मालिश करने वाले व्यक्ति को न तो गृध्रसी रोग न पांव का फटना ( पाददारी, बिवाई आदि रोग ), और न शिरा या स्नायुओं का संकुचित होना ( पाँव के ज्ञान तन्तुओं या मांस पेशियों का संकुचित होना ) होते हैं ।