चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ
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पा० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २६३
वृष्य मधुक योग—मुलहठी का चूर्ण १ कर्ष, घी और शहद पृथक् २ एक
कर्ष मिलाकर चाटे, पीछे से दूध पी ले । इस प्रयोग से पुरुष का नित्य वेग
रहता है ॥ १६ ॥
घृतक्षीराशनो निर्भीर्निर्व्याधिर्नित्यगो युवा ।
सङ्कल्पप्रवणो नित्यं नरः स्त्रीषु वृषायते ॥ २० ॥
जो व्यक्ति प्रतिदिन घी और दूध का पर्याप्त मात्रा में सेवन करता है, भय
और रोग रहित, नित्य प्रति व्यवाय करनेवाला, सदा रमण की इच्छा रखता
हुआ युवा पुरुष सदा मैथुन करने में समर्थ रहता है ॥ २० ॥
कृतैककृत्याः सिद्धार्था ये चान्योन्यानुवर्तिनः ।
कलासु कुशलास्तुल्याः सत्त्वेन वयसा च ये ॥ २१ ॥
कुलमाहात्म्यदाक्षिण्यशीलशौचसमन्विताः ।
ये कामनित्या ये हृष्टा ये विशोका गतव्यथाः ॥ २२ ॥
ये तुल्यशीला ये भक्ता ये प्रिया ये प्रियंवदाः ।
तैर्नरः सह विश्रब्ध सुवयस्यैर्वृषायते ॥ २३ ॥
एक ही काम करनेवाले, सिद्ध साध्य ( अथवा जिनके मतलब परस्पर
निकलते हैं ), जो एक दूसरे के पीछे चलते हैं एक दूसरे का कहा मानते हैं,
गीत, वादित्र आदि कलाओं मे कुशल, मन और आयु में समान, उत्तम कुल,
बड़प्पन, दाक्षिण्य ( चतुराई ), शील, पवित्रता से युक्त, सदा कामुक, प्रसन्न
चित्त, शोक और पीड़ा से रहित, समान स्वभाव के, परस्पर विश्वासी, प्रिय
( इच्छुक ), मधुर भाषी हों, ऐसे विश्वासपात्र मित्रों के साथ रहने से पुरुष
वीर्य सम्पन्न होता है ॥ २१-२३ ॥
अभ्यङ्गोत्सादनस्नानगन्धमाल्यविभूषणैः ।
गृहशय्यासनसुखैर्वासोभिरहतः प्रियैः ॥ २४ ॥
विहङ्गानां रुतैरिष्टैः स्त्रीणा चाभरणस्वनैः ।
संवाहनवरस्त्रीणामिष्टाना च वृषायते ॥ २५ ॥
अभ्यंग ( मालिश ), उबटन, स्नान, गन्ध, माला, आभूषण, आराम-
वाला घर, कोमल शय्या, सुन्दर आसन, प्रिय नवीन वस्त्र, पक्षियों का कलरव
और वाञ्छित स्त्रियों से, आभूषणों की झकार से, सुन्दर स्त्रियों द्वारा संवाहन
अर्थात् मुठिया भर कर दबाने से पुरुष में वृषता आती है ॥ २४-२५ ॥
मत्तद्विरेफाचरिताः सपद्माः सलिलाशयाः ।
जात्युत्पलसुगन्धीनि शीतगर्भंगृहाणि च ॥ २६ ॥