चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 318, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें३०४ चरकसंहिता [ अ० ३ का मांस गुरु और उष्ण है, इसलिये इनका उपयोग ज्वर मे नही करना चाहिये। परन्तु यदि ज्वर मे उपवास के कारण वायु का बल प्रबल हो जाये तो मात्रा और विकल्पो को जानने वाले वैद्यको चाहिये कि इनका भी प्रयोग करे ॥१६४॥ घर्माम्बु चानुपानार्थं तृषिताय प्रदापयेत् । मद्यं वा मद्यसात्म्याय यथादोषं यथाबलम् ॥ १६५ ॥ गुरूष्णस्निग्धमधुरकषायांश्च नवज्वरे । ज्वर मे प्यास लगने पर उपरोक्त आहार के अनुपान मे गरम पानी देना चाहिये। जिस रोगी को मद्य-सात्म्य हो, उसका दोष और बल के अनुसार मद्य देना चाहिये ॥ १६५ ॥ आहारान् दोषपक्त्यर्थं प्रायशः परिवर्जयेत् ॥ १६६ ॥ अनुपानक्रमः सिद्धो ज्वरघ्नः संप्रकाशितः । नवज्वर (तरुण ज्वर) मे दोषो के पाचन के लिये गुरु, उष्ण, स्निग्ध, मधुर और कषाय रस वाले भोजनो का प्राय करके त्याग कर देना चाहिये । इस प्रकार से ज्वरनाशक और फलप्रद अनुपान क्रम कह दिया ॥ १६६ ॥ अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यन्ते कषाया ज्वरनाशनाः ॥ १६७ ॥ पाक्यं शीतकषायं वा मुस्तपर्पटकं पिबेत् । सनागरं पर्पटकं पिबेद्वा सदुरालभम् ॥ १६८ ॥ किराततिक्तकं मुस्तं गुडूचीं विश्वभेषजम् । पाठामुशीरं सोदीच्यं पिबेद्वा ज्वरशान्तये ॥ १६६ ॥ ज्वरघ्ना दीपनाश्चैते कषाया दोषपाचनाः । तृष्णाऽरुचिप्रशमना मुखवैरस्यनाशनाः ॥ २०० ॥ पटोलं सारिवां मुस्तं पाठां कटुकरोहिणीं । कलिङ्गकाः पटोलस्य पत्रं कटुकरोहिणी ॥ २०१ ॥ निम्बः पटोलस्त्रिफला मृद्वीका मुस्तवत्सकौ । किराततिक्तममृता चन्दनं विश्वभेषजम् ॥ २०२ ॥ गुडूच्यामलकं मुस्तमर्धश्लोकसमापनाः । कषायाः शमयन्त्याशु पञ्च पञ्चविधाञ्ज्वरान् ॥ २०३ ॥ सन्ततं सततमन्येद्युस्तृतीयकचतुर्थकान् । वत्सकारग्वधं पाठां षड्ग्रन्थां कटुरोहिणीम् ॥ २०४ ॥ मूर्वां सातिविषां निम्बं पटोलं धन्वयासकम् । वचां मुस्तमुशीराणि मधुकं त्रिफलां बलाम् ॥ २०५ ॥