चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 350, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें३३६ चरकसंहिता [ अ० ४ पेया—मसूर, पृश्निपर्णी से सिद्ध पेया अथवा (६) स्थिरा (शालपर्णी) और मूग से साधित पेया रक्तपित्त मे हितकारी है । (७) रेणुका के रस मे (८) घृतयुक्त बला रस मे या (६) पारावत आदि के मास-रस मे साधित पेया रक्तपित्त मे हितकारी है । पेया के लिये शालि, साठी, नीवार आदि धान्या का उपयोग करे । इन यवागू, पेयाअं को ठण्डा करके मधु और शर्करा से मीठा बनाकर देवे । जिस प्रकार से उपरोक्त रसों मे यवागू तैयार की जाती है, उसी प्रकार इन रसा मे मास-रस भी सिद्ध करके देवे । रक्तपित्त रोग मे यदि विवन्ध (कब्ज) हो तो बथुए के साथ खरगोश का मास सिद्ध करके देवे । यदि रक्त- पित्त म वायु का जार हा तो गूलर के रस मे तीतर का मासरस सिद्ध करके देवे । मोर को पिलखन के रस मे, सुगे को बरगद के रस मे, बेलगिरी और कमल के रस से बर्त्तक और कुक्कुर के मासरस को सिद्ध करके देवे । उष्णवीर्य होने पर भी प्रतिनियत सावक द्रव्य के संयोग से ही ये वस्तुए रक्तपित्त मे हितकारी है ॥ ४३-५० ॥ तृष्यते तिक्तकैः सिद्धं तृष्णाघ्नं वा फलोदकम् । सिद्धं विदारिगन्धाद्यैरथवा शृतशीतलम् ॥ ५१ ॥ ज्ञात्वा दोषावनुबलौ बलमाहारमेव च । जलं पिपासवे दद्याद्विसर्गादल्पशोऽपि वा ॥ ५२ ॥ निदानं रक्तपित्तस्य यत्किंचित्संप्रकाशितम् । जीवितारोग्यकामैस्तन्न सेव्यं रक्तपित्तिभिः ॥ ५३ ॥ इत्यन्नपानं निर्दिष्टं क्रमशः रक्तपित्तिषु । रोगी को प्यास लगे तो तिक्त द्रव्यों से सिद्ध जल, तृष्णानाशक फालसा आदि फलो का पानी या विदारीगन्धादि (स्वल्प पञ्चमूल) गण से सिद्ध जल अथवा गरम करके ठण्डा बनाया पानी देवे । रक्तपित्त रोग मे दोष (कफ और वायु) का तथा रोगी के बल और आहार का पहिचान कर प्यास की शान्ति के लिये यथेच्छ अथवा थोड़ा थोड़ा पानी देवे । यदि अग्नि बलवान् हो और शरीर महान् हो तो यथेच्छ पानी देवे, वैसे थोडा २ देवे । रक्तपित्त के जिन रोगियो को जीवन और आरोग्य की चाह हो, रक्तपित्त रोग के जो कारण बतलाये है वे उनका सेवन न करे, वे उनसे परहेज करते रहे । इस प्रकार रक्तपित्त रोगियों की यथाक्रम चिकित्सा कह दी है ॥ ५१-५३ ॥ वक्ष्यते बहुदोषाणां कार्यं बलवता च यत् ॥ ५४ ॥ अक्षीणबलमांसस्य यस्य संतर्पणोत्थितम् ।