चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 514, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें५३० चरकसंहिता [अ० १३ इसमें अपथ-जलचर तथा जलमय प्रदेश के जन्तुओं का मास, शाक (पत्ते आदि), पिष्ठी से बने पदार्थ, तिल, व्यायाम, पैदल, यात्रा, दिन मे सोना, सवारी पर चढ़ कर यात्रा करना इन सब बातों को छोड़ दे। इसी प्रकार से उदर-रोगी उष्ण, खट्टे, लवणयुक्त, विदाही और भारी पदार्थों का सेवन तथा पानी का पीना त्याग कर दे ॥६८-६६॥ नातिसान्द्रं मतं पाने स्वादु तक्रमपेलवम् ॥ १०० ॥ त्र्यूषणक्षारलवणैर्युक्तं तु निचयोदरी । वातोदरी पिबेत्तक्रं पिप्पलीलवणान्वितम् ॥ १०१ ॥ शर्करामधुकोपेतं स्वादु पित्तोदरी पिबेत् । यवानीसैन्धवाजाजीव्योषयुक्तं कफोदरी ॥ १०२ ॥ पिबेन्मधुयुतं तक्रं व्यक्ताम्लं नातिपेलवम् । मधुतैलवचाशुण्ठीशताह्वाकुष्ठसैन्धवैः ॥ १०३ ॥ युक्तं प्लीहोदरी जातं सव्योपं तूदकोदरी । यवानी हपुषाजाजीसैन्धवैर्ग्रथितोदरी ॥ १०४ ॥ पिबेच्छिद्रोदरी तक्रं पिप्पलीक्षौद्रसंयुतम् । उदर रोगी को चाहिये कि पीने के लिये न तो बहुत घना (थोड़ा गाढ़ा), मधुर, तुरन्त का तैय्यार किया, अपेलव अर्थात् मक्खन निकाला तक्र पीये । सन्निपातोदरी-रोगी को चाहिये कि तक्र मे सोठ, मरिच, पिप्पली, क्षार और नमक मिलाकर पीये । वातोदरी-रोगी तक्र मे पिप्पली और लवण मिलाकर पीये । पित्तोदरी-रोगी शर्करा और मरिच से युक्त तक्र पीये । कफोदरी-रोगी यवानी (अजवायन), सैन्धव और जीरा तथा सोठ, मरिच, पिप्पली से युक्त तक्र पिये । प्लीहोदर रोगी को चाहिये कि मधु युक्त, अम्ल रस बहुत मक्खन वाला नहीं (साधारण चिकास वाला) तक्र पिये । इस तक्र में मधु, तैल, वच, सोंठ, सौफ, कूठ, सैन्धा नमक मिलाकर पीये । दकोदर-रोगी सोंठ, मरिच, पिप्पली से युक्त छाछ पीये । ग्रथितोदर-रोगी यवानी (अजवायन), हऊबेर, जीरा और नमक से मिश्रित तक्र पिये । छिद्रोदर-रोगी पिप्पली और मधु से मिश्रित छाछ पीये ॥ १००-१०४ ॥ गौरवारोचकार्तानां समन्दाग्न्यतिसारिणाम् ॥ १०५ ॥ तक्रं वातकफार्तानाममृतत्वाय कल्पते । भारीपन तथा अरुचि के साथ जिन लोगों को मन्दाग्नि रहती हो, अतिसार हो तथा वातजन्य, कफजन्य उदर-रोग मे तक्र अमृत के समान गुणकारी है ॥१०५॥