भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 570

५८६ चरकसंहिता [ अ० १४ अवाक्पुष्पी बला दार्वा पृश्निपर्णी त्रिकण्टकः । न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थशुङ्गाश्च द्विपलोन्मिताः ॥ २३५ ॥ कषाय एषा पेष्यास्तु जीवन्ती कटुरोहिणी । पिप्पली पिप्पलीमूलं नागरं सुरदारु च ॥ २३६ ॥ कलिङ्गाः शाल्मलं पुष्प वीरा चन्दनमुत्पलम् । कट्फल चित्रकं मुस्तं प्रियङ्ग्वतिविषास्थिराः ॥ २३७ ॥ पद्मोत्पलाना किञ्जल्कः समङ्गा सनिदिग्धिक। । बिल्वं मोचरसः पाठा भागाः कर्षसमन्विताः ॥ २३८ ॥ चतुःप्रस्थे शृतं प्रस्थं कषायमवतारयेत् । त्रिशत्पलानि प्रस्थोऽत्र विज्ञेयो द्विपलाधिकः ॥ २३९ ॥ सुनिषण्णकचाङ्गेर्याः प्रस्थौ द्वौ स्वरस्य च । सर्वैरेतैैर्यथोद्दिष्टैर्घृतप्रस्थ विपाचयेत् ॥ २४० ॥ एतदशर्शःस्वतीसारे रक्तस्रावे त्रिदोषजे । प्रवाहणे गुदभ्रंशे पिच्छासु विविधासु च ॥ २४१ ॥ उत्थाने चातिबहुशः शोथशूले गुदाश्रये । मूत्रग्रहे मूढवाते मन्देऽग्नावरुचावपि ॥ २४२ ॥ प्रयोज्यं विधिवत्सर्पिर्बलवर्णामिवर्धनम् । विविधेष्वन्नपानेषु केवलं वा निरत्ययम् ॥ २४३ ॥ इति सुनिषण्णकचाङ्गेरीघृतम् । (७५) चागेरी घृत—अवाक् पुष्पी (ओधा हुली), खरैटी, दारु हल्दी, पृश्निपर्णी, गोखरू, बरगद, गूलर, पीपल इनके कोमल पत्ते प्रत्येक वस्तु दो-दो पल लेकर चार प्रस्थ पानी मे कषाय करना चाहिये । जब एक प्रस्थ रह जाये तब उतार कर छान लेना चाहिये । यह कषाय एक प्रस्थ, चागेरी का स्वरस दो प्रस्थ और सुनिषण्णक (सुरवारी) का स्वरस दो प्रस्थ, घी एक प्रस्थ, कल्कर्थ—जीवन्ती, कुटकी, पिप्पली, पिप्पलीमूल, सोठ देवदारु, इन्द्रजौ, सिम्बल के फूल, वीरा (शालपर्णी या शतावरी), चन्दन, कमल, कायफल, चीता, मोथा, प्रियगु, अतीस, शालपर्णी, पद्म का केशर, उत्पल का केशर, लाजवन्ती, छोटी कटेरी, बेलगिरी, सिम्बल का गोंद, पाठा प्रत्येक वस्तु एक कर्ष लेकर, पीस कर कल्क बनाना चाहिये । इन सब से यथाविधि घृत-पाक करना चाहिये । यह घृत अर्शंरोग मे, अतीसार मे, त्रिदोषजन्य रक्तस्राव मे, प्रवाहण मे, गुदभ्रश मे, नाना प्रकार की पिच्छाओं मे, बार-बार थोड़ा-थोड़ा मल त्याग होने मे, गुदा की शोथ या शूल मे, मूत्र की रुकावट में, मूढवात मे,