दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)
महाकवि दण्डी द्वारा
स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)
पृष्ठ 417, कुल 474 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टमोच्छ्वासः ] बालविबोधिनीव्याख्यासहितम् । ४१७ दुर्जयोपाध्यायः कामतन्त्रकर्णधारः कुमारसेवको विहारभद्रो नाम स्मित- पूर्वं व्यज्ञापयत्— (७) 'देव, दैवानुग्रहेण यदि कश्चिद्भाजनं भवति विभूतेः, तमक- स्मादुच्चावचैरुपप्रलोभनैः कदर्धयन्तः स्वार्थं साधयन्ति धूर्ताः। तथाहि- केचित्प्रेत्य किल लभ्यैरभ्युदयातिशयैराशामुत्पाद्य, मुण्डयित्वा शिरः, बद्ध्वा दर्भरज्जुभिः, अजिनेनाच्छाद्य, नवनीतेनोपलिप्य, अनशनं च शयित्वा सर्वस्वं स्वीकरिष्यन्ति । तेभ्योऽपि घोरतराः पाषण्डिनः पुत्रदार- अन्यजनात्तु का कथा । उत्कोचहारी गुप्तरूपेण द्रव्यग्रहणपरः । कुमारसेवकः कुमारा- वस्थामारभ्य राज्ञः सेवकः । (७) भाजनं पात्रम् । विभूतेः ऐश्वर्यस्य । उच्चावचैर्नानाविधैः । कदर्ध- यन्तो गर्हयन्तः । केचित् केचन धूर्ताः । स्वीकरिष्यन्तीत्यनेनान्वयः । प्रेत्य मर- णानन्तरम् । अजिनेन मृगचर्मणा । सर्वस्वम् अन्यस्य सर्व धनम् । स्वीकरिष्यन्ति ग्रहीष्यन्ति । यज्ञदीक्षितस्य शिरोमुण्डनं कुशरज्जुभिर्वेष्टन, मृगचर्माच्छादनमन- शनञ्च प्रसिद्धमेव । तेभ्यो धूर्तेभ्योऽपि पाषण्डिनः भ्रष्टाः । पुत्रदारेति पुत्रदारा- दीन्यकिञ्चित्कराणि धर्मं एवाश्रयणीय इत्यादि कथयित्वा जनान् स्वस्वपुत्रकलत्रा- राजाकी उसपर दया भी रहती थी। वह वाद्य-नृत्य-गीतादि विद्याओंमें पारंगत, वेश्या- गामी, व्यंग्य बोलनेमें कुशल, मुँहफट तथा अन्योंके रहस्यभेद जाननेमें प्रवीण, परनिन्दामें तत्पर और चुगलखोर एवं मन्त्रिमण्डलोंसे भी घूस लेनेमें दक्ष, लम्पटों तथा दुष्टोका मुखिया, कामतन्त्रवेत्ता, नायक-नायिकाको मिलानेमें पाखट और निपुण था। उसने राजाकी समस्त बातें श्रवण कर हँसते हुए कहा- (७) हे देव ! सौभाग्यसे यदि कोई धनिक हो जाता है तो वृथा ही धूर्तगण उसे इधर- उधरकी बातें बताकर उसके मस्तिष्कको बिगाड़कर अपना स्वार्थसाधन करते रहते हैं। कितने धूर्त तो ऐसे भी होते हैं जो सीधे-सादे धनिकको अपनी कपटकला द्वारा फँसाकर उसके चित्तमें ऐसी आशा जमाते हैं कि वह मृगचर्मकी लँगोटी धारण कर कई दिनोंतक उपवास करने लगता है और फिर धीरे धीरे समय पाकर वे धूर्त उसका सर्वस्व हरण कर लेते हैं। जो धूर्त इन कथित धूर्तोंसे और अधिक बड़े होते हैं वे तो स्त्री, पुत्र, भाई आदि में भी पार्थक्य करा देते हैं; यहाँ तक कि शरीर और जीवन तकसे विभेद कराकर अपना स्वार्थ सिद्ध कर लेते हैं। यदि कोई पट्ट शिष्य उन धूर्तोंके बताये मार्गसे नहीं चलता और अपनी हस्तगत सम्पत्ति नहीं नष्ट करता है तो उसके समीप और अनेक धूर्तंराट् आ जाते हैं और आकर उपदेश देने लगते हैं- मैं एक कौड़ीसे लाखों रुपये बना सकता