देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 751, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७४२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
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| गृहीतं देवसदनं तेन देव बलीयसा।<br>किं कर्तव्यमतः शम्भो ब्रूहि सत्यं शिवाद्य नः॥ ५२ | हे देव! उस महाबलीने देवलोकपर अधिकार कर लिया है। हे शम्भो! हे शिव! अब हमें क्या करना चाहिये, आप हमें सही-सही बताइये॥ ५२॥ | | किं कुर्मः क्व च गच्छामः स्थानभ्रष्टा महेश्वर।<br>दुःखस्य नाधिगच्छामो विनाशोपायमीश्वर॥ ५३ | हे महेश्वर! हम राज्यभ्रष्ट क्या करें और कहाँ जायँ? हे ईश्वर! हम इस दुःखके विनाशके लिये कोई भी उपाय नहीं जान पा रहे हैं॥ ५३॥ | | साहाय्यं कुरु भूतेश व्यथिताः स्म कृपानिधे।<br>वृत्रं जहि मदोत्सिक्तं वरदानबलाद्विभो॥ ५४ | हे भूतेश! हमारी सहायता कीजिये। हे कृपानिधान! हम सब बहुत दुःखी हैं। हे विभो! वरदानके प्रभावसे मदोन्मत्त वृत्रासुरका वध कीजिये॥ ५४॥ | | शिव उवाच<br>ब्रह्माणं पुरतः कृत्वा वयं सर्वे हरेः क्षयम्।<br>गत्वा समेत्य तं विष्णुं चिन्तयामो वधोद्यमम्॥ ५५ | शिवजी बोले—ब्रह्माजीको आगे करके हमलोग विष्णुलोक चल करके वहाँ उन श्रीहरिके पास जाकर उस वृत्रासुरके वधके उपायपर विचार करेंगे॥ ५५॥ | | स शक्तश्च छलज्ञश्च बलवान्बुद्धिमत्तरः।<br>शरण्यश्च दयाब्धिश्च वासुदेवो जनार्दनः॥ ५६ | वे जनार्दन भगवान् विष्णु शक्तिशाली, छलकार्यमें निपुण, बलवान्, सबसे बुद्धिमान्, शरणदाता और दयाके सागर हैं॥ ५६॥ | | विना तं देवदेवेशं नार्थसिद्धिर्भविष्यति।<br>तस्मात्तत्र च गन्तव्यं सर्वकार्यार्थसिद्धये॥ ५७ | उन देवदेवेशके बिना हमारा प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा, इसलिये सभी कार्योंकी सिद्धिके लिये हमें वहीं चलना चाहिये॥ ५७॥ | | व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य ते सर्वे ब्रह्मा शक्रः सशङ्करः।<br>जग्मुर्विष्णोः क्षयं देवाः शरण्यं भक्तवत्सलम्॥ ५८ | व्यासजी बोले—ऐसा विचारकर ब्रह्मा, शिव तथा इन्द्र आदि सभी देवता शरणदाता और भक्तवत्सल भगवान् विष्णुके लोक गये॥ ५८॥ | | गत्वा विष्णुपदं देवास्तुष्टुवुः परमेश्वरम्।<br>हरिं पुरुषसूक्तेन वेदोक्तेन जगद्गुरुम्॥ ५९ | वैकुण्ठधाममें पहुँचकर वे देवता वेदोक्त पुरुषसूक्तसे उन परमेश्वर जगद्गुरु श्रीहरिकी स्तुति करने लगे॥ ५९॥ | | प्रत्यक्षोऽभूज्जगन्नाथस्तेषां स कमलापतिः।<br>सम्मान्य च सुरान्सर्वानित्युवाच पुरःस्थितः॥ ६० | तब भगवान् जगन्नाथ कमलापति विष्णु उनके सम्मुख उपस्थित हो गये और सभी देवताओंका सम्मान करके उनसे बोले—॥ ६०॥ | | किमागताः स्म लोकेशा हरब्रह्मसमन्विताः।<br>कारणं कथयध्वं वः सर्वेषां सुरसत्तमाः॥ ६१ | हे लोकपालगण! आपलोग ब्रह्मा और शिवजीके साथ यहाँ क्यों आये हैं? हे श्रेष्ठ देवताओ! आप सभी अपने आगमनका कारण बतायें॥ ६१॥ | | व्यास उवाच<br>इति श्रुत्वा हरेर्वाक्यं नोचुर्देवा रमापतिम्।<br>चिन्ताविष्टाः स्थिताः प्रायः सर्वे प्राञ्जलयस्तथा॥ ६२ | व्यासजी बोले—भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर भी देवगण उन रमापतिसे कुछ बोल न सके और वे चिन्तातुर होकर हाथ जोड़े खड़े ही रहे॥ ६२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे ब्रह्मनेतृत्वे सेन्द्रैः सुरैर्विष्णोः शरणगमनवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥