देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ७४४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
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| अजेयः सर्वभूतानां त्वष्ट्रा समुपपादितः।<br>ततो बलेन वृद्धिं स प्राप्तः परपुरञ्जयः ॥ १० | त्वष्टाके द्वारा उत्पन्न किया गया यह वृत्रासुर समस्त प्राणियोंके लिये अजेय हो गया है। शत्रुओंके राज्यको जीत लेनेवाला वह अपनी शक्तिसे अधिक प्रबल हो गया है ॥ १० ॥ |
| दुःसाध्योऽसौ सुराः शत्रुर्विना सामप्रतारणम्।<br>प्रलोभ्य वशमानेयो हन्तव्यस्तु ततः परम् ॥ ११ | हे देवताओ! बिना सामनीतिके प्रयोगके वह वृत्रासुर देवताओंके लिये दुःसाध्य है, अतः पहले इसे प्रलोभन देकर वशमें करना चाहिये, तत्पश्चात् मार डालना चाहिये ॥ ११ ॥ |
| गच्छध्वं सर्वगन्धर्वा यत्रास्ति बलवत्तरः।<br>साम तस्य प्रयुञ्जध्वं तत एनं विजेष्यथ ॥ १२ | हे गन्धर्वगण! जहाँ वह बलवान् वृत्रासुर रहता है, वहाँ तुमलोग जाओ और उसपर सामनीतिका प्रयोग करो; तभी उसपर विजय प्राप्त कर सकोगे ॥ १२ ॥ |
| सङ्गम्य शपथान्कृत्वा विश्वास्य समयेन हि।<br>मित्रत्वं च समाधाय हन्तव्यः प्रबलो रिपुः ॥ १३ | वहाँ जाकर अनेक शपथें खाकर सन्धिके द्वारा उसे विश्वासमें ले करके और पुनः मित्रताकर बादमें उस प्रबल शत्रुको मार डालना चाहिये ॥ १३ ॥ |
| अदृश्यः सम्प्रवेक्ष्यामि वज्रमस्य वरायुधम्।<br>साहाय्यं च करिष्यामि शक्रस्याहं सुरोत्तमाः ॥ १४ | हे श्रेष्ठ देवगण! मैं अदृश्य रूपमें इन्द्रके श्रेष्ठ आयुध वज्रमें प्रवेश कर जाऊँगा और उनकी सहायता करूँगा ॥ १४ ॥ |
| समयं च प्रतीक्षध्वं सर्वथैवायुषः क्षये।<br>मरणं विबुधास्तस्य नान्यथा सम्भविष्यति ॥ १५ | हे देवताओ! अब आपलोग समयकी प्रतीक्षा करें, वृत्रासुरकी आयुके क्षीण होनेपर ही उसकी मृत्यु होगी, अन्य किसी भी प्रकारसे नहीं ॥ १५ ॥ |
| गच्छध्वमृषिभिः सार्धं गन्धर्वाः कपटावृताः।<br>इन्द्रेण सह मित्रत्वं कुरुध्वं वाक्यदानतः ॥ १६ | हे गन्धर्वगण! तुमलोग वेष बदलकर ऋषियोंके साथ उसके पास जाओ और वचनबद्धतापूर्वक इन्द्रके साथ उसकी मित्रता करा दो ॥ १६ ॥ |
| यथा स याति विश्वासं तथा कार्यं प्रतारणम्।<br>गुप्तोऽहं सम्प्रवेक्ष्यामि पविं सञ्छादितं दृढम् ॥ १७ | जिस प्रकारसे उसका विश्वास दृढ़ हो जाय, वैसा ही आप सबको करना चाहिये। मैं सुदृढ़ तथा आवरणयुक्त वज्रमें गुप्तरूपसे प्रवेश कर जाऊँगा ॥ १७ ॥ |
| विश्वस्तं मघवा शत्रुं हनिष्यति न चान्यथा।<br>विश्वासस्य कृते पापं कृत्वा शक्रस्तु पृष्ठतः ॥ १८<br><br>मत्सहायोऽथ वज्रेण शातयिष्यति पापिनम्।<br>न दोषोऽत्र शठे शत्रौ शाठ्यमेव प्रकुर्वतः ॥ १९<br><br>नान्यथा बलवान्वध्यः शूरधर्मेण जायते।<br>वामनं रूपमाधाय माययं वञ्चितो बलिः ॥ २० | जब वृत्रासुरको पूर्ण विश्वास हो जाय तभी इन्द्र उस शत्रु का वध करेंगे। उसके वधका अन्य कोई उपाय नहीं है। वे इन्द्र विश्वासघात करके मेरी सहायतासे वज्रद्वारा पीछेसे उस पापीको मार डालेंगे। इस दुष्ट शत्रुके साथ शठता करनेमें दोष नहीं है। अन्यथा वह बलवान् वीरधर्मसे नहीं मारा जा सकेगा। पूर्वकालमें मैंने भी वामनरूप धारणकर बलिको वंचित किया था और मोहिनीरूप धारणकर सभी दैत्योंको छला था ॥ १८–२० १/२ ॥ |
| कृत्वा च मोहिनीवेषं दैत्याः सर्वेऽपि वञ्चिताः।<br>भवन्तः सहिताः सर्वे देवीं भगवतीं शिवाम् ॥ २१ | हे देवताओ! अब आप सब लोग एक साथ देवी भगवती शिवाकी शरणमें जायँ और भावपूर्वक |