भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 754, कुल 889 में से

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पृष्ठ 754

| अ० ५ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७४५ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गच्छध्वं शरणं भावैः स्तोत्रमन्त्रैः सुरोत्तमाः।<br>साहाय्यं सा योगमाया भवतां संविधास्यति॥ २२स्तोत्रों और मन्त्रोंसे उनकी स्तुति करें। वे भगवती योगमाया आपलोगोंकी सहायता करेंगी॥ २१-२२॥
वन्दामहे सदा देवीं सात्त्विकीं प्रकृतिं पराम्।<br>सिद्धिदां कामदां कामां दुरापामकृतात्मभिः॥ २३हम सभी उन सात्त्विकी, परा प्रकृति, सिद्धिदात्री, कामनास्वरूपिणी, भक्तोंकी कामना पूर्ण करनेवाली और दुराचारियोंके लिये दुर्लभ देवीकी सदा वन्दना करते हैं॥ २३॥
इन्द्रोऽपि तां समाराध्य हनिष्यति रिपुं रणे।<br>मोहिनी सा महामाया मोहयिष्यति दानवम्॥ २४<br><br>मोहितो मायया वृत्रः सुखसाध्यो भविष्यति।<br>प्रसन्नायां पराम्बायां सर्वं साध्यं भविष्यति॥ २५<br><br>नोचेन्मनोरथावाप्तिर्न कस्यापि भविष्यति।<br>अन्तर्यामिस्वरूपा सा सर्वकारणकारणा॥ २६<br><br>तस्मात्तां विश्वजननीं प्रकृतिं परमादृताः।<br>भजध्वं सात्त्विकैर्भावैः शत्रुनाशाय सत्तमाः॥ २७इन्द्र भी उनकी आराधना करके युद्धमें शत्रुको मार डालेंगे। वे मोहिनी महामाया उस दानव वृत्रासुरको मोहित कर देंगी। तब मायासे मोहित वृत्रासुर सुगमतापूर्वक मारा जा सकेगा। उन पराम्बाके प्रसन्न होनेपर सब कुछ साध्य हो जायगा। अन्यथा किसीकी भी कामनाकी पूर्ति नहीं होगी। वे भगवती सबकी अन्तर्यामिस्वरूपिणी और सभी कारणोंकी भी कारण हैं। इसलिये हे श्रेष्ठ देवगण! शत्रुके विनाशके लिये सात्त्विक भावोंसे युक्त होकर उन प्रकृतिस्वरूपा जगज्जननीका परम आदरपूर्वक भजन कीजिये॥ २४-२७॥
पुरा मयापि संग्रामं कृत्वा परमदारुणम्।<br>पञ्चवर्षसहस्राणि निहतौ मधुकैटभौ॥ २८<br><br>स्तुता मया तदात्यर्थं प्रसन्ना प्रकृतिः परा।<br>मोहितौ तौ तदा दैत्यौ छलेन च मया हतौ॥ २९<br><br>विप्रलब्धौ महाबाहू दानवौ मदगर्वितौ।<br>तथा कुरुध्वं प्रकृतेर्भजनं भावसंयुताः॥ ३०<br><br>सर्वथा कार्यसिद्धिं सा करिष्यति सुरोत्तमाः।<br>एवं ते दत्तमतयो विष्णुना प्रभविष्णुना॥ ३१पूर्वकालमें मैंने भी पाँच हजार वर्षोंतक अत्यन्त भीषण युद्ध करके मधु-कैटभका वध किया था। उस समय मैंने उन पराप्रकृतिकी स्तुति की थी, तब वे अत्यन्त प्रसन्न हो गयी थीं। तत्पश्चात् उनके द्वारा मोहित दोनों दैत्योंको मैंने छलपूर्वक मार डाला था। मोहित किये गये विशाल भुजाओंवाले वे दोनों दानव अत्यन्त मदोन्मत्त थे। इसलिये आपलोग भी उसी प्रकार भावपूर्वक उन पराप्रकृतिका भजन कीजिये। हे देवगण! वे सब प्रकारसे कार्यकी सिद्धि करेंगी॥ २८-३० १/२॥
जग्मुस्ते मेरुशिखरं मन्दारद्रुममण्डितम्।<br>एकान्ते संस्थिता देवाः कृत्वा ध्यानं जपं तपः॥ ३२<br><br>तुष्टुवुर्जगतां धात्रीं सृष्टिसंहारकारिणीम्।<br>भक्तकामदुघामम्बां संसारक्लेशनाशिनीम्॥ ३३इस प्रकार भगवान् विष्णुसे परामर्श प्राप्त करके वे मन्दार वृक्षोंसे सुशोभित सुमेरुपर्वतके शिखरपर चले गये। वे देवता वहाँ एकान्तमें बैठकर ध्यान, जप और तप करके जगत्का सृजन-पालन-संहार करनेवाली, भक्तोंके लिये कामधेनुस्वरूपा एवं संसारके क्लेशोंका नाश करनेवाली पराम्बा भगवतीकी इस प्रकार स्तुति करने लगे॥ ३१-३३॥
देवा ऊचुः<br>देवि प्रसीद परिपाहि सुरान्प्रतप्तान्<br>वृत्रासुरेण समरे परिपीडितांश्च।<br>दीनार्तिनाशनपरे परमार्थतत्त्वे<br>प्राप्तांस्त्वदङ्घ्रिकमलं शरणं सदैव॥ ३४**देवता बोले—**हे देवि! हे दीनोंके कष्ट दूर करनेवाली! हे परमार्थतत्त्वस्वरूपिणि! हमपर प्रसन्न हों, वृत्रासुरके द्वारा सताये गये, युद्धमें अत्यन्त पीड़ित किये गये तथा आपके चरणकमलकी शरणमें सदासे पड़े हुए हम देवताओंकी रक्षा कीजिये॥ ३४॥