भारतकोश
देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

Devi Gita from Devi Bhagavata Purana with Hindi Commentary

आद्याशक्ति भगवती / महर्षि वेदव्यास / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished40 पृष्ठ

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और अनेकप्रकार संस्कारयुक्त कूटस्थ ब्रह्मरूपसे सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि करके उसके भीतर चिदाभासरूपसे प्राणवायु आगे करके प्रवेश करती हूं ॥ ३ ॥ हे गिरिवर ! इसप्रकार मेरे प्राणस्वीकारपूर्वक प्रवेशनकरनेपर लोकान्तरगमन जन्म और मरणादि व्यवहार किसप्रकार सिद्ध होसके हैं ? जिसप्रकार एकमात्र व्यापक महाकाश उपाधि भेदसे घटाकाश और मठाकाश इत्यादि भिन्न भिन्न नामसे विख्यात होतेहैं इसीप्रकार मैं अनेक स्थलमें प्राणस्वीकार करके अविद्या और अन्तःकरणके प्रभेदसे हेतु भिन्न भिन्न होती हूं अतएव उससेही अनेकप्रकार भिन्नभिन्न जीवोंकी उत्पत्ति होती है ॥ ४ ॥ जिसप्रकार सूर्य स्वीय किरणसंयोगसे पृथ्वीकी सम्पूर्ण वस्तु प्रदीपितकरके भी दूषित नहीं होता इसीप्रकार मैंभी उत्कृष्ट और निकृष्ट सम्पूर्ण वस्तुके अन्तःप्रवेश हेतु दोषलिप्त नहीं होती ॥ ५ ॥ मद्धुद्धि अज्ञानद्वारा बुद्धयादिनिष्ठ कर्तृत्व आत्मरूपिणी मुझमें आरोपित करके आत्माकोही कर्ता कहते हैं किन्तु बुद्धिमान् पंडितगण उसको स्वीकार नहीं करते फलतः मैं जीवके भीतर कत्रींरूपसे न रहकर साक्षीरूपसे स्थिति करती हूं ॥ ६ ॥ हे अचलेन्द्र ! अविद्या और विद्याके भेदहेतु जीवबहुत्व और ईश्वरबहुत्व प्रतिपादित होता है फलतः मायाद्वारा ही मनुष्य पशु इत्यादि जीवभेद और ब्रह्मा, विष्णु इत्यादिमें ईश्वरभेद होता है ॥ ७ ॥ जिसप्रकार महाकाश घटावच्छिन्न होनेपर महाकाश और घटाकाश ऐसा विभाग कल्पित होता है इसीप्रकार व्यापक परमात्मा जीवावच्छिन्न होकर परमात्मा और जीवात्माका इसप्रकार भेद कल्पित होता है ॥ ८ ॥ जिसप्रकार जीवका बहुत्व मायाद्वारा कल्पित होता है स्वभावसे नहीं होता इसीप्रकार ईश्वरबहुत्वभी स्वभावसे नहीं होता मायाद्वाराही कल्पित होता है ॥ ९ ॥ हे धरणीधर ! देह इन्द्रिय और मन इत्यादिके भेदसे अविद्या ही जीवके भेदका हेतु है अन्य कुछ नहीं है ॥ १०॥ और जो तीनों गुणकी वासनाभेदसे अर्थात् सात्विक राजसिक और तामसिक वासनाभेदसे मायाकीभी भिन्नता उत्पन्न होती है ॥ ११ ॥ वह विभिन्नमायाही ब्रह्मा विष्णु इत्यादि ईश्वरके भेदका कारण है नहीं तो और कुछ नहीं है हे धराथरेन्द्र ! यह सम्पूर्ण जगत् ओत प्रोतभावसे मुझमें ही स्थित रहता है ॥ १२ ॥ अतएव मैं ही कारणदेहाभिमानी ईश्वर लिंगदेहाभिमानी सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ और स्थूल देहाभिमानी विराट् हूं मैं ही ब्रह्मा विष्णु महेश्वर और मैं ही ब्राह्मी वैष्णवी और रौद्री शक्ति हूं ॥ १३ ॥ मैं ही सूर्य मैंही चन्द्रमा मैं ही तारका और मैं ही पशु पक्षी चाण्डाल और तस्कर हूं ॥ १४ ॥ मैंही