देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)
Devi Gita from Devi Bhagavata Purana with Hindi Commentary
आद्याशक्ति भगवती / महर्षि वेदव्यास / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२५ सप्तमस्कंध-अ० ३१. (७३३) तेन्द्रिय संसारज्ञानरहित और समाधियुक्त होकर देवीके स्वरूपका ध्यान करते करते काल व्यतीत करनेलगे ॥ ५ ॥ इस समय देवीके विना चराचरयुक्त यह त्रैलोक्यमण्डल ऐश्वर्यरहित और पर्वत, समुद्र तथा द्वीप सहित यह सम्पूर्ण भूमण्डल शक्तिविहीन होगया ॥ ६ ॥ सम्पूर्ण जीवोंके हृदयका आनन्द शुष्क होगया सम्पूर्ण मनुष्य चिन्ताके कारण जर्जरचित्त हो दीनभावसे अवस्थिति करने लगे ॥ ७ ॥ सब दुःखसागरमें निमग्न होकर रोगग्रस्त होनेलगे ग्रहोंकी विपरीत गति और देवताओंकी विपरीत अवस्था होनेलगी ॥ ८ ॥ राजालोग सतीके अभावसे आधिभौतिक और आधिदैविक दुःख परम्पराके आधीन होकर स्थिति करनेलगे ॥ ९ ॥ इसीसमय तारकनामक महासुर ब्रह्माजीसे वर प्राप्तकर अत्यन्त दुर्जय हो उठा वह वीर मदसे मत्त हो त्रिभुवनको जीत त्रैलोक्यका एकमात्र अधी- श्वर होगया ॥ १० ॥ प्रजापति ब्रह्माके “शिवका औरस पुत्र तुम्हारा हन्ता होगा” इसप्रकार वरदान करनेपर और उससमय शिवके औरस पुत्रका अभाव होनेके कारण वह महासुर सदा आनन्दसे उन्मत्त होकर जयका अभिमान करनेलगा ॥ ११ ॥ सम्पूर्ण देवता उसके उपद्रवसे स्थानभ्रष्ट होकर शिवका औरस पुत्र न होनेके कारण दुस्तर चिन्तासागरमें निमग्न हुए ॥ १२ ॥ सती देवीके इससमय प्राण त्यागनेपर महादेव भार्यारहित हुएहैं अतएव इस समय किसप्रकार उनके सुतोत्पत्ति सम्भव होसक्ती है ? हम अत्यन्त भाग्यहीन हैं कारण कि शंकरकी पुत्रोत्पत्तिके अभावसे हमारा कार्य सिद्ध होना अत्यन्त कठिन होगया ॥ १३ ॥ इसप्रकार चिन्तासे कातर होकर सम्पूर्ण देवता वैकुण्ठमण्डलमें गये और निर्जनमें भगवान् विष्णुसे समस्त वृत्तान्त निवेदन करनेपर वह उस विषयका उपाय कहनेलगे ॥ १४॥ हे सुरगण ! जब मणिद्वीपनिवासिनी वाञ्छाकल्पद्रुमरूपिणी कल्याणदायिनी करुणामयी देवी भुवनेश्वरी हमारे लिये सदा जागरित रहतीहै तब तुम चिन्तासे व्याकुल क्यों होतेहो ॥ १५॥ वह जगज्जननी केवल हमारे अपराधसे हमको शिक्षा देनेके लिये उपेक्षा दिखाती हैं हे देवताओ ! तुम निश्चय जानों कि, वह शिक्षा हमारे विनाशके निमित्त नहीं है हमारे प्रति करुणा दिखानेके लियेही वह करती हैं॥ १६॥ जिसप्रकार अपनी सन्तानके लालन पालन और ताड़न विषयमें माताकी दयाहीनता नहीं दिखाई देती इसीप्रकार तुम्हारे गुण दोष विषयमें वह जगन्नियन्त्री जगज्जननी कभी निर्दय नहीं होगी ॥ १७ ॥ सन्तानसे अपराध पद पदपर होता है त्रैलोक्यमें एकमात्र जननीके