भारतकोश
देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

Devi Gita from Devi Bhagavata Purana with Hindi Commentary

आद्याशक्ति भगवती / महर्षि वेदव्यास / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

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बिना और कौन उसको सहसक्ता है? ॥ १८ ॥ अतएव तुम शीघ्रही एकान्त भक्तिसहित उन्हीं परमजननी परमेश्वरीकी शरणागत होओ अवश्यही वह तुम्हारे कार्यसाधनमें यत्न करेंगी ॥ १९ ॥ देवाधिपति महाविष्णु देवताओंसे इसप्रकार आदेशकर निजजाया लक्ष्मीके सहित देवीकी आराधनाके लिये देवताओंको संग ले शीघ्र निकले ॥ २० ॥ फिर शीघ्र शैलाधिपति हिमालयमें जाय समस्तही पुरश्चरण करनेमें प्रवृत्त हुए ॥ २१ ॥ हे नृपवर ! अम्बायज्ञके जाननेवाले देवताओंने अम्बा- यज्ञ आरम्भ किया और सम्पूर्णही तृतीयादि व्रतका अनुष्ठान करने लगे ॥ २२ ॥ कोई कोई देवीकी समाधि अर्थात् उनके धारावाहिक ध्यानमें परायण हुए कोई कोई निरन्तर उनका नाम जपने लगे कोई कोई देवीसूक्त जप करनेमें प्रवृत्त हुए कोई कोई नामपरायण ॥ २३ ॥ अथवा कोई कोई मंत्रपरायण हुए और कोई कोई कृच्छ्र चान्द्रायणादि व्रतपरायण हुए कोई कोई अन्तर्यागमें कोई कोई प्राणाग्निहोत्र योगमें अथवा कोई कोई न्यासादिमें नियुक्त हुए ॥ २४ ॥ और कोई २ अतन्द्रित होकर मायाबीजमंत्रद्वारा परमाशक्ति भुवनेश्वरीकी पूजा करने लगे हे महाराज ! इसप्रकार देवताओंको बहुत वर्ष व्यतीत होगये ॥ २५ ॥ फिर एक दिन चैत्रमासकी नवमी तिथि और भृगुवारमें वह श्रुतिबोधित शक्तिसम्बन्धीय परमज्योतिः अकस्मात् उनके सामने प्रगट हुई ॥ २६ ॥ यह तेज करोड करोड विद्युत्की समान अरुणवर्ण और करोड करोड चन्द्रमाकी समान शीतल था उस परमज्योतिकी प्रभा करोड़ करोड़ सूर्यकी समान थी चारों ओर अवस्थित होकर मूर्तिमान् चारों वेद उसका स्तव करते थे वह तेजोरारिश क्या ऊर्द्धमें क्या पार्श्वमें क्या मध्यमें किसी दिशामें परिच्छिन्न नहीं हुई ॥ २७ ॥ २८ ॥ उसका आदिभी नहीं और अन्तभी नहीं वह हस्तपादादि अंगसंयुक्त स्त्रीरूप पुरुषरूप अथवा नपुंसकरूप भी नहीं थी ॥ २९ ॥ देवताओं ने प्रथम उस तेजकी प्रभासे हत होकर नेत्र मूंदलिये किन्तु क्षणकालमें ही धैर्य्य अवलम्बन कर ज्योंही नेत्र खोले ॥ ३० ॥ त्योंही वह परमज्योति अतिमनो- हर दिव्य रमणीरूपसे प्रकाशित हुई उस मनोरमाङ्गी नवयौवना कुमारीके ॥ ३१ ॥ कमलकलकानिन्दित दोनों कुच ऊँचे परम शोभायमान होरहे थे कमरमें किंकिणी मेखलाके शब्द और चरणोंसे मनोहर मंजीरकी ध्वनि आती थी ॥ ३२ ॥ उसके चारों हाथोंमें कनकवलय चारों बाहुओंमें केयूर ग्रीवादेशमें ग्रैवेयक गलदेशमें अमूल्य मणि हार गलबन्ध और परमोज्वल प्रभाजाल विस्तारित होकर शोभा पारहा था

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