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देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

Devi Gita from Devi Bhagavata Purana with Hindi Commentary

आद्याशक्ति भगवती / महर्षि वेदव्यास / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

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[Header] १२७ सप्तमस्कंध-अ० ३१. (७३५)

[Body text] ॥ ३३ ॥ उनके कर्ण और कपोलके मध्यवर्ती केशावली नवकेतकीपुष्पपत्रोपरि विराजित दीप्तप्रभ नीलवर्ण भ्रमरावलीके समान समुज्ज्वल शोभा पाती है नितम्बबिम्ब सुघटित और अत्यन्त मनोहर रोमराजि नाभिमें विराजित होकर अपूर्व शोभा सम्पादन करती है ॥ ३४ ॥ दीप्यमान कनकतातङ्कमें उज्ज्वल परम सुन्दर मुख- कमल कर्पूरखण्डमिश्रित ताम्बूलसे पूर्ण ॥ ३५ ॥ ललाटमें अर्द्धचन्द्र शोभायमान दोनों भौंए चौड़ी नेत्रोंने उपांतभागमें कोकनदके समान अर्थात् लालकमलके समान शोभा धारण की है नासिका ऊंची अधर बिम्बाफलके समान अति मनोहर ॥ ३६ ॥ सम्पूर्ण दाँत कुन्द कलीके समान अत्यन्त मनोहर गलेमें लम्बायमान मोतियोंका हार विराजमान है मस्तकके ऊपर हीरक और मणिरत्नमें खचित प्रदीप्त मुकुटालङ्कार कर्णमें चन्द्ररेखाकी समान करनफूल ॥ ३७ ॥ केशपाश मल्लिका और मालतीकी मालासे सुशोभित ललाट काश्मीरबिन्दुद्वारा सुसज्जित और तीनों नेत्र मुखमण्डलकी अपूर्व शोभा सम्पादन करते हैं ॥ ३८ ॥ उनके एक हस्तमें पाश और दूसरे हाथमें अंकुश तथा अन्यान्य दोनों हाथ वर और अभयदान भङ्गिमासे विराजित देहकी क्रान्ति दाड़मीके फूलकी समान परिधान अरुणवर्ण अम्बर परमशोभा विस्तार करते हैं ॥ ३९ ॥ देवताओंने इसप्रकार समस्त शृङ्गारवेषधारिणी समस्त वाञ्छापूरिणी सम्पूर्ण देवताओंसे नमस्कृत हास्याननी अरिबलमोहिनी ॥ ४० ॥ अखिलजननी प्रसादसुमुखी कपटतारहित करुणाकी मूर्तिरूपिणी अम्बिकादेवीको सामने देखा ॥ ४१ ॥ उस करुणामयी मूर्त्तिको देखकर देवताओंने प्रणाम किया किन्तु बाष्पभारसे कण्ठ रुकजानेके कारण कुछभी न कहसके ॥ ४२ ॥ फिर अति कष्टसे धैर्य अवलम्बनकर भक्तिमें भर शिर झुकाय प्रेम अश्रुपूर्ण नेत्रोंसे जगदम्बिकाका स्तव करने लगे ॥ ४३ ॥ देवताओंने कहा हे जगदम्बिके ! आप देवी और महादेवी हैं तथा आपही शिवरूपिणी हैं हम सदा संयतचित्तसे आपको वारंवार प्रणाम करते हैं हे देवि ! आपही साम्यावस्थाविशिष्ट मायोपाधियुक्त ब्रह्मरूपिणी प्रकृति और आपही सर्वकल्याणरूपिणी हैं हम संयतमनसे आपके चरणकमलोंमें प्रणाम करते हैं ॥ ४४ ॥ हे जननि ! आपही योगियोंके हृदयमें अनल शिखाकी समान अरुणवर्णसे दीप्ति पाती हैं आपही ज्ञानप्रभासे दीप्यमान हैं हे मातः ! आपही इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें चैतन्यरूपसे सर्वत्र प्रकाशित होती हैं ब्रह्मादि देवता और मानवादि जीवगण कर्मफलप्राप्तिके लिये आपकी

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