भारतकोश
देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

Devi Gita from Devi Bhagavata Purana with Hindi Commentary

आद्याशक्ति भगवती / महर्षि वेदव्यास / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

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(७३६) देवीभागवत-भाषा । १२८ सेवा करते हैं हे देवि ! आपही संसारसागरसे तारनेवाली हैं अतएव हम घोर संसारसमुद्रसे पार होनेके लिये आपकी शरणागत होकर आपको वारंवार नमस्कार करते हैं ॥ ४५ ॥ हे मातः ! प्राणादिपञ्चवायुकी सहायतासे जो सम्पूर्ण भावप्रकाशवाक्य उच्चारित होते हैं हम उसको माया कहते हैं वह माया हमारी कामधेनु अर्थात् हम उस कामधेनुरूपिणी मायासे इच्छानुसार धन, मान और अन्नादि दुहकर अहङ्कारमें उन्मत्त होते हैं हे मातः ! आप हमारी वही भाषा- स्वरूप हैं अतएव आप सन्तुष्ट होकर हमारी वाञ्छा पूर्ण कीजिये ॥ ४६ ॥ हे देवि ! आप सर्वसंहारकर कालकाभी संहार करती हैं भगवान् पद्मयोनि ब्रह्मा सदा आपकी स्तुति करते हैं हे मातः ! आपही विष्णुशक्ति लक्ष्मी स्कन्दमाता शिवशक्ति पार्वती ब्रह्मशक्ति सरस्वती देवमाता अदिति और आपही सतीनाम्नी दक्षकी कन्या हैं हे मातः ! आप ही इसप्रकार अनेकरूप धारण करके अखिलब्रह्माण्डपूत और सम्पूर्ण को शान्तिदान करती हैं अतएव हे देवि ! आपको प्रणाम करते हैं ॥ ४७ ॥ हम आपको ही महालक्ष्मी जानते हैं हम आपको सर्वशक्तिरूपिणी देवी भगवती जानकर आपका ध्यान करते हैं हे जननि ! आप ही हमको अपने श्रवण, मनन और ध्यानमें प्रेरण कीजिये ॥ ४८ ॥ हे देवि ! आप ही विराट्रूपिणी हैं आपको नमस्कार है आपही सूत्रात्मा, हिरण्यगर्भरूपिणी हैं आपको नमस्कार है आप ही महदादि षोडशविकृतिरूपिणी हैं आपको नमस्कार है हे मातः ! आपही ब्रह्मारूपिणी हैं आपको हम नमस्कार करते हैं ॥ ४९ ॥ जिनके सृष्टि अविद्याजनित ज्ञानसे यह जगत् रज्जु और स्रगादि (मालाआदि) में सर्पकी समान सत्य जानकर भ्रम होता है फिर जिनके सृष्टिविद्याजनित ज्ञानसे वह भ्रम दूर होता है हम भक्तिनम्रमनसे उन्हीं सर्वा- न्तर्यामिनी भगवती भुवनेश्वरीका ध्यान करते हैं ॥५०॥ “तत्त्वमसि” इस महावाक्यस्थ तत् शब्दकी प्रतिपाद्य जो सम्पूर्णदेवताओंकी तात्पर्यभूमि चैतन्यरसरूपिणी और अखण्डानन्दस्वरूप ब्रह्मस्वरूपिणी ॥ ५१ ॥ तथा जो अन्नमय, प्राणमय, मनोमय विज्ञानमय और आनन्दमय इन पञ्चकोशके अतिरिक्त हैं जो जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओंकी साक्षिणी और जो त्वम्पदकी भी लक्ष्यार्थ हैं हम उन्हीं ज्ञानब्रह्मस्वरूपिणी भुवनेश्वरी देवीका ध्यान करते हैं ॥ ५२ ॥ हे मातः ! आपही प्रणवरूपिणी ह्रींकारमूर्ति नानाविधमन्त्रात्मिका और करुणामयी हो हम आपके चरणकमलोंमें वारम्बार प्रणाम करते हैं ॥ ५३ ॥