BharatKosha
Back to the archive

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

by महापण्डित राहुल सांकृत्यायन

DevanagariHindipublished213 pages
Page 205Permalink

( १९४ ) मासे मासे कुस- ५।११ यस्स कायेन २६।९ मासे मासे सहस्सेन ८।७ यस्स गतिं २६।३८ मिद्धी यथा २३।६ यस्स चेतं समु- १९।८ मुञ्च पुरे २४।१५ यस्स चेत समु- १८।१६ मुहुत्तमपि ५।६ यस्स छत्तिंसती २४।६ मेत्ताविहारी २५।९ यस्स जालिनी १४।२ य अच्चन्त- १२।६ यस्स जितं १४।१ यं एसा सहती २४।२ यस्स पापं १३।७ यं किञ्चि यिट्ठं ८।९ यस्स पारं अपार २६।३ यं किञ्चि सि- २२।७ यस्स पुरे च २६।३९ यन्चे विष्णू १७।९ यस्स रागो च २६।२५ यतो यतो सम्म- २५।१५ यस्सालया न २६।२९ यथागारं दुच्छन्नं १।१३ यस्सासवा ७।४ यथागारं सुच्छन्नं १।१४ यस्सिन्द्रियाणि ७।५ यथा दण्डेन १०।७ यानि' मानि ११।४ यथापि पुप्फ- ८।१० याव जीवम्पि ५।५ यथापि भमरो ४।६ यावदेव अनत्थाय ५।१३ यथापि मूले २४।५ याव हि वनो २०।१२ यथापि रहदो ६।७ ये च खो ६।११ यथापि रुचिरं ४।८,९ ये झानपसुता १४।३ यथा बुब्बुलकं १३।४ ये रागरत्ता २४।१४ यथा सङ्कार- ४।१५ येसं च सुसमा- २१।४ यदा द्वयेसु २६।२ येसं सन्निचयो ७।३ यम्हा धम्मं २६।१० येसं सम्बोधि ६।१४ यं हि किच्चं २१।३ यो अप्पदुट्ठस्स ९।१० यम्हि सच्चं च १९।६ यो इमं पलिपथं २६।३२

Page 206Permalink

( १९५ ) योगा वे जायती २०।१० वची पकोपं १७।१२ यो च गाथा- ८।३ वज्जं वज्जतो २२।१४ यो च पुब्बे १३।६ वनं छिन्दथ २०।११ यो च बुद्धञ्च १४।१२ वर अस्सतरा २३।३ यो च अनत्तकसाव- १।१० वस्सिका विय २५।१८ यो च वस्ससतं ८।८ बहुम्पि चे १।१९ यो च समेति १९।१० बहुं वे सरणं १४।१० यो चेतं सहती २४।३ वाचानुरक्खी २०।९ यो दण्डेन १०।९ वाणिजो' व ९।८ यो दुक्खस्स २६।२० वारिजो' व ३।२ यो'ध कामे २४।३३ वाळसंगतचारी १५।११ यो'ध तण्हं २६।३४ वाहितपापो २६।६ यो'ध दीघं २६।२७ वितक्कमथितस्स २४।१६ यो'ध पुञ्जं २६।३० वितक्कूपसमे च २४।१७ यो'ध पुब्बं १९।१२ वीततण्हो अनादानो २४।१९ यो निब्बनथो २४।११ वेदनं फरुसं १०।१० यो पाणमतिपातेति १८।१२ सु चे नेरेसि १०।६ यो बालो ५।४ स चे लभेथ २३।९ यो मुख- २५।४ सच्चं भणे १७।४ यो वे उप्पतितं १७।२ सदा जागरमानानां १७।६ यो सहस्स- ८।४ सद्धो सीलेन २१।१४ यो सासनं १२।८३ सन्तकायो २५।११ यो ह वे दहरो २५।२३ सन्तं तस्स ७।७ रतिया जायते १६।६ सब्बत्थ वे ६।८ रमणीयानि अरञ्ञानि ७।१० सब्बदानं २४।२१ राजतो वा १०।११ सब्बपापस्स १४।५

Page 207Permalink

( १९६ ) सब्बसंयोजनं २६।१५ सुखो बुद्धानं १४।१६ सब्बसो नाम- २५।८ सुजीवं १८।१० सब्बाभिभू २४।२० सुञ्ञागारं २५।१४ सब्बे तसन्ति १०।१,२ सुदस्सं वज्ज- १८।१८ सब्बे धम्मा २०।७ सुदुद्दसं ' ३।४ सब्बे सङ्खारा अ- २०।५ सुप्पबुद्धं २१।७—१२ सब्बे सङ्खारा दु- २०।६ सुभानुपस्सिं १।७ सरितानि २४।८ सुरामेरयपानं १८।१३ सलाभं २५।६ सुसुखं वत १५।१—४ सवन्ति सब्ब- २४।७ सेखो पठविं ४।२ सहस्समपि चे गाथा ८।२ सेय्यो अयो- २२।६ सहस्समपि चे वाचा ८।१ सेलो यथा ६।६ साधु दस्सन— १५।१० सो करोहि १८।२,४ सारञ्च १।१२ हत्थसञ्ञतो २५।३ सिञ्च भिक्खु २५।१० हनन्ति भोगा २४।२२ सीलदस्सन— १६।९ हंसा' दिच्च- १३।९ सुकरानि १२।७ हित्वा मानुसकं २६।३५ सुखकामानि १०।३,४ हित्वा रतिं २६।३६ सुखं याव २३।१४ हिरीनिसेधो १०।१५ सुखा मत्तेय्यता २३।१३ हिरीमन्ता च १८।११ हीनं धम्मं १३।१ ——————

Page 208Permalink

शब्द-सूची अकिञ्चन—राग, द्वेष और मोहसे रहित । अनुसय (=अनुशय)—कामराग (=भोगतृष्णा), प्रतिघ (=प्रति- हिंसा), दृष्टि (=उल्टी धारणा), विचिकित्सा (=सन्देह), मान (=अभिमान), भवराग, (=संसारमें जन्मनेकी तृष्णा), अविद्या । अरिय (=आर्य)—स्रोतआपन्न, सकृदागामी, अनागामी, अर्हत् (=मुक्त) । आभस्सर (=आभास्वर)—रूपलोक (=जहाँके प्राणियोका शरीर प्रकाशमय है) की एक देवजाति । आयतन—आँख, कान, नाक, जीभ, काया (=त्वक्) और मन । आसवू (=आस्रव मल),—कामास्रव (=भोगसंबधी मल), भवास्रव (=भिन्न भिन्न लोकोंमें जन्म लेनेका कारणरूपी मल), दृष्ट्यास्रव (=उल्टी धारणा रूपी मल), अविद्यास्रव । उपधि (=उपाधि)—स्कन्ध, काम, क्लेश और कर्म । खन्ध (=स्कन्ध)—रूप (=परिमाण और तोल रखनेवाला तत्त्व), वेदना, संज्ञा, संस्कार, (वेदना आदि तीन, रूप और १९७

Page 209Permalink

( १९८ ) विज्ञानके सम्पर्कसे उत्पन्न विज्ञानकी अवस्थायें हैं); विज्ञान (=चेतना, परिमाण और तोल न रखनेवाला रूप )। थेर—(=स्थविर ) वृद्ध भिक्षु । थेरी—(=स्थविरा ) वृद्ध भिक्षुणी । पातिमोक्ख (=प्रातिमोक्ष)—विनय पिटकमे कहे भिक्षु-भिक्षुणियोंके पाराजिक, संघादिसेंस आदि नियम । भिक्षुओंके लिये उनकी संख्या इस प्रकार है— पाली विनय (सर्वास्तिवाद) १. पाराजिक ४ ४ २. संघावशेष १३ १३ ३. अनियत २ २ ४. निसर्गिक ३० ३० ५ पायत्तिक ९२ ९० ६. प्रातिदेशनीय ४ ४ ७. शैक्ष ७५ ११३ ८. अधिकरणशमथ ७ ७ २२७ २६३

Page 210Permalink

( १९९ ) (=परम ज्ञानकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न न करके, बाह्य आचार और व्रतोंसे कृतकृत्यता मानना ), 'कामराग (=स्थूल-शरीर- धारियों के भोगोंकी तृष्णा ), रूपराग (=प्रकाशमय शरीर धारियोंके भोगोंकी तृष्णा ), अरूपराग (=रूपरहित देवताओंके भोगोंकी तृष्णा ), प्रतिघ (=प्रतिहिंसा ), मान (=अभि- मान ), औद्धत्य (=उद्धतपना ), और अविद्या । सम्बोज्झङ्ग (=संबोध्यंग )—स्मृति, धर्मविचय [(=धर्मपरीक्षा ), वीर्य (=उद्योग ), प्रीति, प्रश्रब्धि (=शान्ति ), समाधि, उपेक्षा । सामणेर (=श्रामणेर )—भिक्षु होनेका उम्मेदवार बौद्ध साधु, जिसे भिक्षुसंघने अभी उपसम्पन्न (=भिक्षुदीक्षासे दीक्षित ) नहीं किया । सील (=शील )—हिंसा-विरति, मिथ्याभाषण-विरति, चोरीसे विरति, व्यभिचारविरति, मादक द्रव्य सेवन-विरति—यह पाँच शील (=सदाचार ) गृहस्थ और भिक्षु दोनोंके समान हैं। अपराह्नभोजन त्याग, नृत्य गीत त्याग, माला आदिके शृंगार का त्याग, महार्घ शय्याका त्याग, तथा सोने चाँदीका त्याग, यह पाँच केवल भिक्षुओंके शील हैं। सेख (=शैक्ष्य )—अर्हत् (=मुक्त ) पदको नहीं प्राप्त हुए, आर्य (=स्रोतआपन्न, सकृदागामी, अनागामी ) शैक्ष्य कहे जाते हैं, क्योंकि वह अभी शिक्षणीय हैं। सोतापन्न (=स्रोतआपन्न )—आध्यात्मिक विकास करते जब प्राणी इस प्रकारकी मानसिक स्थितिमें पहुँच जाता है, कि, फिर वह नीचे नहीं गिर सकता और निरन्तर आगे ही बढ़ता

Page 211Permalink

( २०० ) जाता है; ऐसी अवस्थामें पहुँचे पुरुषको सोतापन्न कहते हैं। स्रोत (=श्रोतः)=निर्वाणगामी नदी प्रवाहमें जो आपन्न (=पड़ गया) है।* प्रज्ञाप्रासादमारुह्याऽशोच्यः शोचतो जनान्। भूमिष्ठानिव शैलस्थः सर्वान् प्राज्ञोऽनुपश्यति योगभाष्य १।४७ कामं कामयानस्य यदा कामः समृध्यते। अथैनमपरः कामः क्षिप्रमेव प्रधावते ॥ न्यायभाष्य ४।१।५७ न तेन वृद्धो भवति—म० ० । धम्म० १६।४

Page 212Permalink

महाबोधि-सभा (संस्थापक—भिक्षु श्री देवमित्र धर्मपाल) चालीस वर्षसे यह सभा भारतियोंको आत्मविस्मृतिसे उठाने, एवं भगवान् बुद्धके दिव्य सन्देशको पहुँचानेका प्रयत्न कर रही है। निम्न संस्थाओंका यह संचालन कर रही है— १. मूलगन्धकुटी विहार, ऋषिपत्तन, सारनाथ (बनारस)। एक लाखसे ऊपर रुपये खर्च कर ७०० वर्ष बाद सभाने (१) इस मन्दिरको उस पवित्र स्थान पर बनवाया है, जहाँ पर भगवान् बुद्धने संसारको सब प्रथम अपना धर्म-सन्देश दिया। (२) इसके साथ ही ८०००) के व्ययसे पुस्तकालय-भवन बनाया गया है। इसके साथ पुस्तकालय, अन्तर्राष्ट्रीय-विद्यालय, भिक्षु-आश्रम, निःशुल्क हिन्दी स्कूल हैं। शीघ्र ही एक धर्मार्थ चिकित्सालय भी खुलने जा रहा है। २. श्रीधर्मराजिका-चैत्य-विहार, ४ए, कालेज स्कायर, कलकत्ता। मंदिर, विश्रामगृह, पुस्तकालय, वाचनालयके साथ। ३. झाडिवत्था-स्मारक धर्मशाला, मेकवर्गोपगंज, गया। संसार भरके बौद्ध यात्रियोंकेलिये धर्मशाला, साथ ही एक निःशुल्क पाठशाला भी है। ४. महाबोधि-विश्रामगृह, बोधगया। ५. फोस्टर-स्मारक-शाला, पेराम्बुर, मद्रास। विश्राम-गृह, प्रचार- केन्द्र और प्राथमिक स्कूल। ६. Mahabodhi Journal (Calcutta), यह मासिकपत्र ४० वर्ष से निकल रहा है। वार्षिक मूल्य ५) है। ७५) भेजकर आजही सब ग्राहक बन सकते हैं। इनके अतिरिक्त इङ्गलैण्ड और युरोपमें बौद्धधर्म-प्रचारकेलिये लन्दनमें प्रचारक-मंडल (Buddhist Mission, 41, Gloucester Road, London, N. W. 1.) है। कोलम्बो में भी चिकित्सालय, विद्यालय आदि कितनी ही संस्थायें हैं। ऐसी संस्था आपकी सहायताका पात्र है। —ब्रह्मचारी देवप्रिय, प्रधान मंत्री, महाबोधिसभा, ऋषिपत्तन, सारनाथ (बनारस)।

Page 213Permalink

विक्रेय पुस्तकें अनागारिक धर्मपाल— भगवान बुद्धके उपदेश (हिन्दी) What did Lord Buddha teach ? 0 4 0 Relation between Buddhism and Hinduism 0 4 0 World's Debt to Buddhism 0 4 0 पंडित शिवनारायण— Sarnath—A Guide 0 3 0 Buddhism 0 2 0 Asoka 0 2 0 Dr. S. N. दासगुप्त— Message of Buddhism 0 2 0 Miss A. C. Albers,— Jataka Stories for children 0 4 0 Life of Buddha for children 0 4 0 महाबोधि-पुस्तक-भंडार, ऋषिपतन सारनाथ (बनारस) । Allahabad Law Journal Press, Allahabad