भारतकोश
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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

२. अप्पमादवग्गो (अप्रमाद वर्ग)

३१९ ] चित्तवग्गो [ १९ श्रावस्ती पाँच सौ विपश्यक भिक्षु ४०—कुम्भूपमं कायमिमं विदित्वा नगरूपमं चित्तमिदं ठपेत्वा । योधेथ मारं पञ्ञायुधेन जितं च रक्खे अनिवेसनो सिया ॥८॥ ( कुम्भोपमं कायमिमं विदित्वा नगरोपमं चित्तमिदं स्थापयित्वा । युध्येत मारं प्रज्ञायुधेन जितं च रक्षेत् अनिवेशनः स्यात् ॥८॥ ) अनुवाद—इस शरीरको घड़ेके समान ( भंगुर ) जान, इस चित्तको गढ़ (=नगर)के, समान क़ायम कर, प्रज्ञारूपी हथियारसे मारसे युद्ध करे । जीतनेके बाद ( अपनी ) रक्षा करे, ( तथा ) आसक्तिरहित होवे । श्रावस्ती पूतिगत्त तिस्स ( थेर ) ४१—अचिरं वत'यं कायो पठविं अधिसिस्सति । छुड्डो अपेतविञ्ञाणो निरत्थं 'व कलिङ्गरं ॥६॥ ( अचिरं बतायं कायः पृथिवीं अधिशेष्यते । क्षुद्रोऽपेतविज्ञानो निरर्थ इव कलिङ्गरम् ॥९॥ ) अनुवाद—अहो ! यह तुच्छ शरीर शीघ्र ही चेतनारहित हो निरर्थक काठकी भाँति पृथिवीपर पड़ रहेगा ।

२० ] धम्मपद [ ३।११ कोसल देश नन्द (गोप) ४२-दिसो दिसं यन्तं कयिरा वेरी वा पन वेरिनं । मिच्छापणिहितं चित्तं पापियो'नं ततो करे ॥१०॥ ( द्विट् द्विषं यत् कुर्यात् वैरी वा पुनः वैरिणम् । मिथ्याप्रणिहितं चित्तं पापीयांसं एनं ततः कुर्यात् ॥१०॥ ) अनुवाद—जितनी ( हानि ) शत्रु शत्रु की, और वैरी वैरी की करता है, झूठे ( मार्गपर ) लगा चित्त उससे अधिक बुराई करता है। कोसल देश सोरय्य (थेर) ४३-न तं माता पिता कयिरा अन्ने चापि च जातका । सम्मापणिहितं चित्तं सेय्यसो'नं ततो करे ॥११॥ ( न तत् मातापितरौ कुर्यातां अन्ये चापि च ज्ञातिकाः । सम्यक्प्रणिहितं चित्तं श्रेयांसं एनं ततः कुर्यात् ॥११॥ अनुवाद—जितनी ( भलाई ) न माता-पिता कर सकते हैं, न दूसरे भाई-बन्धु; उससे ( अधिक ) भलाई ठीक ( मार्गपर ) लगा चित्त करता है। ३—चित्तवर्ग समाप्त

४-पुप्फवग्गो श्रावस्ती पाँच सौ भिक्षु ४४-को इमं पठविं विजेस्सति यमलोकञ्च इमं सदेवकं । को धम्मपदं सुदेसितं कुसलो पुप्फमिव पच्चेस्सति ॥१॥ ( क इमां पृथिवीं विजेष्यते यमलोकं च इमं सदेवकम् । को धर्मपदं सुदेशितं कुशलः पुष्पमिव प्रचेष्यति ॥१॥ ) अनुवाद—देवताओं सहित उस यमलोक और इस पृथिवीको कौन विजय करेगा ; सुन्दर प्रकारसे उपदिष्ट धर्मके पदोंको कौन चतुर (पुरुष) पुष्पकी भाँति चयन करेगा ? ४५-सेखो पठविं विजेस्सति यमलोकञ्च इदं सदेवकं । सेखो धम्मपदं सुदेसितं कुसलो पुप्फमिव पच्चेस्सति ॥२॥ ( शैक्षः पृथिवीं विजेष्यते यमलोकं च इमं सदेवकम् । शैक्षो धर्मपदं सुदेशितं कुशलः पुष्पमिव प्रचेष्यति ॥२॥ ) [ २१

२२ ] धम्मपदं [ ४।४ अनुवाद—शैक्ष¹ देवताओं सहित इस यमलोक और पृथिवीको विजय करेगा। चतुर शैक्ष सुन्दर प्रकारसे उपदिष्ट धर्मके पदोंको पुष्पकी भाँति चयन करेगा। श्रावस्ती मरीचि ( कम्मट्ठानिक थेर ) ४६—फेणूपमं कायमिमं विदित्वा मरीचिधम्मं अभिसम्बुधानो ; छेत्वान मारस्स पपुप्फकानि अदस्सनं मच्चुराजस्स गच्छे ॥३॥ (फेनोपमं कायमिमं विदित्वा मरीचिधर्मं अभिसम्बुधानः । छित्त्वा मारस्य प्रपुष्पकाणि अदर्शनं मृत्युराजस्य गच्छेत् ॥ ३ ॥) अनुवाद—इस कायाको फेनके समान जान, या ( मरु-) मरीचिका के समान मान, फन्देको तोडकर, यमराजको फिर न देखनेवाले बनो। श्रावस्ती विडूडभ ४७-पुप्फानि हेव पचिनन्तं व्यासत्तमनसं नरम् । सुत्तं गामं महोघो'व मच्चू आदाय गच्छति ॥ ४॥ ¹ निर्वाणके मार्गपर जो इस प्रकार आरूढ हो गये हैं, कि फिर उनका उससे पतन नहीं हो सकता, ऐसे पुरुषको शैक्ष कहते हैं। उनके तीन भेद हैं— स्रोतआपन्न, सकृदागामी, अनागामी ।

४।६ ] पुप्फवग्गो [ २३ (पुष्पाणि ह्येव प्रचिन्वन्तं व्यासक्तमनसं नरम्। सुप्तं ग्रामं महोध इव मृत्युरादाय गच्छति ॥ ४ ॥ अनुवाद-(राग आदिके) फूलोंको चुननेवाले आसक्तियुक्त मनुष्य- को मृत्यु (वैसे ही) पकड ले जाती है, जैसे सोये गाँवको बड़ी बाढ़ । श्रावस्ती पतिपूजिका ४८-पुप्फानि हेव पचिनन्तं व्यासत्तमनसं नरं । अतित्तं येव कामेसु अन्तको कुरुते वसं ॥५॥ (पुष्पाणि ह्येव प्रचिन्वन्तं व्यासक्तमनसं नरम् अतृप्तं एव कामेषु अन्तकः कुरुते वशम् ॥ ५ ॥ ) अनुवाद-(राग आदि) फूलोंको चुनते आसक्तियुक्त पुरुषको, (जब कि अभी उसने) कामोंमें तृप्ति नहीं प्राप्त की (तभी) यम (अपने) वशमें कर लेता है। श्रावस्ती (कंजूस) कोसिय सेठ ४६-यथापि भमरो पुप्फं वण्णगन्धं अहेठयं । पलेति रसमादाय एवं गामे मुनी चरे ॥६॥ (यथापि भ्रमरः पुष्पं वर्णगन्धं अघ्नन् । पलायते रसमादाय, एवं ग्रामे मुनिश्चरेत ॥ ६ ॥ ) अनुवाद-जिस प्रकार भ्रमर फूलके वर्ण और गंधको बिना हानि पहुँचाये, रसको लेकर चल देता है, वैसे ही गाँवमें मुनि विचरण करे।

२४ ] धम्मपदं [ ४१९ श्रावस्ती पाठिक ( आजीवक साधु ) ५०-न परेस विलोमानि न परेस कताकतं । अत्तनो'व अवेक्खेय्य कतानि अकतानि च ॥७॥ ( न परेषां विलोमानि न परेषां कृताकृतम् । आत्मन एव अवेक्षेत कृतानि अकृतानि च ॥ ७ ॥ ) अनुवाद-न दूसरोके विरोधी ( काम ) करे, न दूसरोंके कृत-अकृत- के खोजमें रहे, ( आदमीको चाहिये कि वह ) अपने ही कृत (=किये) और अकृत (=न किये ) की (खोज करे ) । श्रावस्ती छत्तपाणि ( उपासक ) ५१-यथापि रुचिरं पुप्फं वण्णवन्तं अगन्धकं । एवं सुभासिता वाचा अफला होति अकुब्बतो ॥८॥ ( यथापि रुचिरं पुष्पं वर्णवद् अगन्धकम् । एवं सुभाषिता वाक् अफला भवति अकुर्वतः ॥ ८ ॥ ) अनुवाद-जैसे रुचिर और वर्णयुक्त ( किन्तु ) गंधरहित फूल है, वैसे ही ( कथनानुसार ) आचरण न करनेवालेकी सुभाषित वाणी भी निष्फल है । ५२-यथापि रुचिरं पुप्फं वण्णवन्तं सगन्धकं । एवं सुभासिता वाचा सफला होति कुब्बतो ॥६॥ ( यथापि रुचिरं पुष्पं वर्णवत् सगन्धकम् । एवं सुभाषिता वाक् सफला भवति कुर्वतः ॥ ९ ॥ )

४।११ ] पुप्फवग्गो [ २५ अनुवाद—जैसे रुचिर वर्णयुक्त और गन्धसहित फूल होता है, वैसे ही (वचनके अनुसार काम) करनेवालेकी सुभाषित वाणी सफल होती है । श्रावस्ती पूर्वाराम विशाखा (उपासिका) ५३-यथापि पुप्फरासिम्हा कयिरा मालागुणे बहू । एवं जातेन मच्चेन कत्तब्बं कुसलं बहुं ॥१०॥ (यथापि पुष्पराशेः कुर्यात् मालागुणान् बहून् । एवं जातेन मर्त्येन कर्त्तव्यं कुशलं बहु ॥ १० ॥ ) अनुवाद—जिस प्रकार पुष्पराशिसे बहुतसी मालायें बनाये, उसी प्रकार उत्पन्न हुये प्राणीको चाहिये कि वह बहुतसे भले (कर्मोंको) करे । श्रावस्ती आनन्द (थेर) ५४-न पुप्फगन्धो पटिवातमेति न चन्दनं तगरमल्लिका वा । सतञ्च गन्धो पटिवातमेति सब्बा दिसा सप्पुरिसो पवाति ॥११॥ (न पुष्पगन्धः प्रतिवातमेति न चन्दनं तगर-मल्लिके वा । सतां च गन्धः प्रतिवातमेति सर्वा दिशः सत्पुरुषः प्रवाति ॥११॥)

३. चित्तवग्गो (चित्त वर्ग)

२६ ] धम्मपदं [ ४।१४ अनुवाद—फूलकी सुगंध हवासे उलटी ओर नहीं जाती, न चन्दन, तगर या चमेली (की गंध ही वैसा करती है); किन्तु सज्जनोंकी सुगंध हवासे उलटी ओर जाती है, सत्पुरुष सभी दिशाओंमें (सुगंध) बहाते हैं। ५५-चन्दनं तगरं वापि उप्पलं अथ वस्सिकी। एतेसं गन्धजातानं सीलगन्धो अनुत्तरो ॥१२॥ (चन्दनं तगरं वापि उत्पलं अथ वार्षिकी। एतेषां गन्धजातानां शीलगन्धोऽनुत्तरः ॥१२॥) अनुवाद—चन्दन या तगर, कमल या जूही, इन सभी (की) सुगंधों- से सदाचारकी सुगंध उत्तम है। राजगृह (वेणुवन) महाकस्सप ५६—अप्पमत्तो अयं गन्धो या'यं तगरचन्दनी। यो च सीलवतं गन्धो वाति देवेसु उत्तमो ॥१३॥ (अल्पमात्रोऽयं गन्धो योऽयं तगरचन्दनी। यश्च शीलवतां गन्धो वाति देवेषु उत्तमः ॥१३॥) अनुवाद—तगर और चन्दनकी जो यह गंध फैलती है, वह अल्प- मात्र है; और जो यह सदाचारियोंकी गंध है, (वह) उत्तम (गंध) देवताओंमें फैलती है। राजगृह (वेणुवन) गोधिक (थेर) ५७-तेसं सम्पन्नसीलानं अप्पमादविहारिनं । सम्मदञ्ञाविमुत्तानं मारो मग्गं न विन्दति ॥१४॥

४।१६ ] पुप्फवग्गो [ २७ (तेषां सम्पन्नशीलानां अप्रमाद-विहारिणाम् । सम्यग्-ज्ञा-विमुक्तानां मारो मार्गं न विन्दति ॥१४॥ ) अनुवाद—( जो ) वे सदाचारी निरालस हो विहरनेवाले, यथार्थ ज्ञान द्वारा मुक्त ( हो गये हैं ), ( उनके ) मार्गको मार नहीं पकड सकता । जेतवन गरहादिन्न ५८-यथा संकारधानस्मिं उज्झितस्मिं महापथे । पदुमं तत्थ जायेथ सुचिगन्धं मनोरमं ॥१५॥ ( यथा संकारधान उज्झिते महापथे । पद्म तत्र जायेत शुचिगन्धं मनोरमम् ॥१५॥ ) ५६-एवं संकारभूतेसु अन्धभूते पृथुज्जने । अतिरोचति पञ्ञाय सम्मासम्बुद्धसावको ॥१६॥ ( एवं संकारभूते अन्धभूते पृथग्जने । अतिरोचते प्रज्ञया सम्यक्-संबुद्ध-श्रावकः ॥१६॥ ) अनुवाद—जैसे महापथपर फेंके कूड़ेके ढेरपर मनोरम, शुचिगंध, गुलाब ( =पद्म ) उत्पन्न होवे, इसी प्रकार कूड़े समान अन्धे अज्ञजनों ( =पृथग्-जनों ) में सम्यक्-संबुद्ध ( =यथार्थ ज्ञानी ) का अनुगामी ( अपनी ) प्रज्ञासे प्रकाशमान होता है । ४-पुष्पवर्ग समाप्त

५'—बालवग्गो श्रावस्ती ( जेतवन ) दरिद्र सेवक ६०-दीघा जागरतो रत्ति दीघं सन्तस्स योजनं । दीघो बालानं संसारो सद्धम्मं अविजानतं ॥ १॥ ( दीर्घा जाग्रतो रात्रिः दीर्घं श्रान्तस्य योजनम् । दीर्घो बालानां संसारः सद्धर्मं अविजानताम् ॥१॥ ) अनुवाद—जगतेको रात लम्बी होती है, थकेके लिये योजन लम्बा होता है, सच्चे धर्मको न जाननेवाले मूढोंके लिये संसार ( = आवागमन ) लम्बा है। राजगृह सार्द्धविहारी (=शिष्य ) ६१-चरञ्चे नाधिगच्छेय्य सेय्यं सदिसमत्तनो । एकचरियं दळ्हं कयिरा नत्थि बाले सहायता ॥२॥ ( चरन् चेत् नाधिगच्छेत् श्रेयांसं सदृशं आत्मनः । एकचर्यां दृढं कुर्यात् नास्ति बाले सहायता ॥२॥ ) २८ ]

५।२ ] बालवग्गो [ २९ अनुवाद—यदि विचरण करते अपने अनुरूप भलेमानुषको न पाये, तो दृढ़ताके साथ अकेला ही विचरे, मूर्खसे मित्रता नहीं निभ सकती । श्रावस्ती आनन्द ( सेठ ) ६२—पुत्ता म'त्थि धनम्म'त्थि इति बालो विहञ्ञति । अत्ता हि अत्तनो नत्थि कुतो पुत्तो कुतो धनं ॥३॥ ( पुत्रा मे सन्ति धनं मे ऽस्ति इति बालो विहन्यते । आत्मा हि आत्मनो नास्ति कुतः पुत्रः कुतो धनम् ॥३॥ ) अनुवाद—"पुत्र मेरा है", "धन मेरा है" ऐसा ( करके ) अज्ञ ( नर ) उत्पीड़ित होता है, जब आत्मा ( = शरीर ) ही अपना नहीं, तो कहाँसे पुत्र और धन ( अपना होगा ) । जेतवन गिरहकट चोर ६३—यो बालो मञ्ञती बाल्यं पण्डितो चापि तेन सो । बालो च पण्डितमानी, स वे बालो'ति वुच्चति ॥४॥ ( यो बालो मन्यते बाल्यं पण्डितश्चापि तेन स । बालश्च पंडितमानी स, वै बाल इत्युच्यते ॥४॥ ) अनुवाद—जो ( कि वह ) अज्ञ होकर ( अपनी ) अज्ञताको जानता है, इस ( अंश ) से वह पंडित ( = जानकार ) है । वस्तुतः अज्ञ होकर भी जो पंडित होनेका दम भरता है, वही अज्ञ ( =बाल ) कहा जाता है ।

३० ] धम्मपदं [ ५।७ श्रावस्ती ( जेतवन ) उदायी ( थेर ) ६४-यावजीवम्पि चे बालो पण्डितं पयिरुपासति । न सो धम्मं विजानाति दब्बी सूपरसं यथा ॥ ५॥ ( यावज्जीवमपि चेद् बालः पंडितं पर्युपास्ते । न स धर्मं विजानाति दर्वी सूपरसं यथा ॥५॥ ) अनुवाद—चाहे बाल ( = जड; अज्ञ ) जीवन भर पंडितकी सेवामें रहे ( तो भी ) वह धर्मको ( वैसे ही ) नहीं जान सकता, जैसे कि कलछी ( = दब्बी = दयली ) सूप ( = दाल आदि ) के रसको । श्रावस्ती ( जेतवन ) भद्रवर्गीय ( भिक्षुलोग ) ६५-मुहुत्तमपि चे विञ्ञू पण्डितं पयिरुपासति । खिप्पं धम्मं विजानाति जिह्वा सूपरसं यथा ॥६॥ ( मुहूर्त्तमपि चेद् विज्ञः पंडितं पर्युपास्ते । क्षिप्रं धर्मं विजानाति जिह्वा सूपरसं यथा ॥६॥ ) अनुवाद—चाहे विज्ञ ( पुरुष ) एक मुहूर्त ही पंडितकी सेवामें रहे, ( तो भी वह ) शीघ्र ही धर्मको जान सकता है, जैसे कि जिह्वा सूपके रसको । राजगृह ( वेणुवन ) सुप्पबुद्ध ( कोढ़ी ) ६६-चरन्ति बाला दुम्मेधा अमित्तेनेव अत्तना । करोन्तो पापकं कम्मं यं होति कटुकप्फलं ॥७॥ ( चरन्ति बाला दुर्मेधसोऽमित्रेणेवात्मना । कुर्वन्तः पापकं कर्म यद् भवति कटुकफलम् ॥७॥ )

५।१० ] बालवग्गो [ ३१ अनुवाद—पाप कर्मको—जो कि कटु फल देनेवाला होता है—करते दुष्ट बुद्धि अज्ञ ( जन ) अपने ही अपने शत्रु बनते हैं। जेतवन कोई कस्सप ६७-न तं कम्मं कतं साधु यं कत्वा अनुतप्पति । यस्स अस्सुमुखो रोदं विपाकं पटिसेवति ॥८॥ ( न तत् कर्म कृतं साधु यत् कृत्वाऽनुतप्यते । यस्याश्रुमुखो रुदन् विपाकं प्रतिसेवते ॥८॥ ) अनुवाद—उस कामका करना ठीक नहीं, जिसे करके ( पीछे ) अनुताप करना पड़े, और जिसके फलको अश्रुमुख रोते भोगना पड़े। ( वेणुवन ) सुमन ( माली ) ६८-तञ्च कम्मं कतं साधु यं कत्वा नानुतप्पति । यस्स प्रतीतो सुमनो विपाकं पटिसेवति ॥६॥ ( तच्च कर्म कृतं साधु यत् कृत्वा नानुत्तप्यते । यस्य प्रतीतः सुमना विपाकं प्रतिसेवते ॥९॥ ) अनुवाद—उसी कामका करना ठीक है, जिसे करके अनुताप करना ( = पछताना ) न पड़े, और जिसके फलको प्रसन्न मनसे भोग करे । जेतवन उप्पलवण्णा ( थेरी ) ६६-मधू'व मञ्ञति बालो याव पापं न पच्चति । यदा च पच्चती पापं अथ दुक्खं निगच्छति ॥१०॥

४. पुप्फवग्गो (पुष्प वर्ग)

५२ ] धम्मपदं [ ५।१२ ( मध्विव मन्यते बालो यावत् पापं न पच्यते । यदा च पच्यते पापं अथ दुःखं निगच्छति ॥१०॥ ) अनुवाद—अज्ञ ( जन ) जब तक पापका परिपाक नहीं होता, तब तक उसे मधुके समान जानता है। जब पापका परिपाक होता है, तो दुखी होता है। राजगृह ( वेणुवन ) जम्बुक ( आजीवक साधु ) ७०-मासे मासे कुसग्गेन बालो भुञ्जेथ भोजनं । न सो संखतधम्मानं कलं अग्घति सोळसिं ॥११॥ ( मासे मासे कुशाग्रेण बालो भुंजीत भोजनम् । न स संख्यातधर्माणां कलामर्हति षोडशीम् ॥११॥) अनुवाद—यदि अज्ञ ( पुरुष ) कुशकी नोकसे महीने महीनेपर खाना खाये, तो भी धर्मके जानकारोके सोलहवें भागके भी बराबर ( वह तप ) नहीं हो सकता । राजगृह ( वेणुवन ) अहिपेत ७१-न हि पापं कतं कम्मं सञ्जु खीरं 'व मुच्चति । डहन्तं बालमन्वेति भस्माच्छन्नो 'व पावको ॥१२॥ ( नहि पापं कृतं कर्म सद्यः क्षीरमिव मुंचति । दहन् बालमन्वेति भस्माच्छन्न इव पावकः ॥१२॥) अनुवाद—ताजे दूधकी भाँति किया पाप कर्म, ( तुरन्त ) विकार नहीं लाता, वह भस्मसे ढँकी आगकी भाँति दग्ध करता अज्ञजनका पीछा करता है।

५।१५ ] बालवग्गो [ ३३ राजगृह (वेणुवन) सट्ठिकूट (पेत) ७२-यावदेव अनत्थाय ञत्तं बालस्स जायति । हन्ति बालस्स सुक्कंसं मुद्धमस्स विपातयं ॥१३॥ (यावदेव अनर्थाय ज्ञातं बालस्य जायते । हन्ति बालस्य शुक्लांशं मूर्द्धानमस्य विपातयन् ॥१३॥) अनुवाद—मूर्ख (=बाल) का जितना भी ज्ञान है, (वह उसके) अनर्थके लिये होता है। वह उसकी मूर्धा (=शिर=प्रज्ञा) को गिराकर उसके शुक्ल (=धवल=शुद्ध) अंशका विनाश करता है। जेतवन सुधम्म (थेर) ७३-असतं भावनमिच्छेय्य पुरक्खारञ्च भिक्खुसु । आवासेसु च इस्सरियं पूजा परकुलेसु च ॥१४॥ (असद् भावनमिच्छेत् पुरस्कारं च भिक्षुषु । आवासेषु चैश्वर्यं पूजा परकुलेषु च ॥१४॥) ७४-ममेव कतमञ्ञन्तु गिही पब्बजिता उभो । ममेवातिवसा अस्सु किच्चाकिच्चेसु किस्मिचि । इति बालस्स सङ्कप्पो इच्छा मानो च वड्ढति ॥१५॥ (ममैव कृतं मन्येतां गृहि-प्रव्रजितावुभौ । ममैवातिवशाः स्यातां कृत्याकृत्येषु केषु चित् । इति बालस्य संकल्प इच्छा मानश्च वर्द्धते ॥१५॥) अनुवाद—अप्रस्तुत वस्तुकी चाह करता है, भिक्षुओंमें बडा बनना ३

३४ ] धम्मपदं [ ५।१६ ( चाहता है ), मठो ( और निवासो ) में स्वामीपन (=ऐश्वर्य ) और दूसरे कुलोंमें पूजा ( चाहता है )। गृहस्त और संन्यासी दोनो मेरे ही कियेको मानें, किसी भी कृत्य- अकृत्यमे मेरे ही वशवर्ती हो—ऐसा मूढ़का सकल्प होता है, ( जिससे उसकी ) इच्छा और अभिमान बढ़ते हैं । श्रावस्ती ( जेतवन ) ( बनवासी ) तिस्स ( थेर ) ७५-अञ्‍ञा हि लाभूपनिसा अञ्‍ञा निब्बान-गामिनी । एवमेतं अभिञ्‍ञाय भिक्खू बुद्धस्स सावको ॥ सकारं नाभिनन्देय्य विवेकमनुब्रूहये ॥ १६ ॥ ( अन्या हि लाभोपनिषद् अन्या निर्वाणगामिनी । एवमेतद् अभिज्ञाय भिक्षुर्बुद्धस्य श्रावकः । सत्कारं नाभिनन्देत् विवेकमनुबृंहयेत् ॥१६॥) अनुवाद—लाभका रास्ता दूसरा है, और निर्वाणको लेजानेवाला दूसरा—इस प्रकार इसे जानकर बुद्धका अनुगामी भिक्षु 'सत्कारका अभिनन्दन न करे, और विवेक (=एकान्तचर्या) को बढ़ावे । ५—बालवर्ग समाप्त

६—पण्डितवग्गो जेतवन राध (थेर) ७६—निधीनं'व पत्तारं यं पस्से वज्ज-दस्सिनं । निग्गय्हवादिं मेधाविं तादिसं पण्डितं भजे । तादिसं भजमानस्स सेय्यो होति न पापियो ॥ १ ॥ (निधीनामिव प्रवक्तारं यं पश्येत् वर्ज्यदर्शिनम् । निगृह्यवादिनं, मेधाविनं तादृशं पंडितं भजेत् । तादृशं भजमानस्य श्रेयो भवति न पापीयः ॥ १ ॥ ) अनुवाद—(भूमिमें गुप्त) निधियोंके बतलानेवालेकी तरह, बुराईको दिखलानेवाले ऐसे संयमवादी, मेधावी पंडितकी सेवा करे। ऐसेके सेवन करनेवालेका कल्याण होता है, अमंगल नहीं (होता)। जेतवन अस्सजी, पुनब्बसू ७७—ओवदेय्यानुसासेय्य असब्भा च निवारये । सतं हि सो पियो होति असतं होति अप्पियो ॥ २ ॥ [ २५

१६ ] धम्मपदं [ ६।४ (अववदेदनुशिष्याद् असभ्याच्च निवारयेत् । सतां हि स प्रियो भवति असतां भवत्यप्रियः ॥ २॥ ) अनुवाद—(जो) सदुपदेश देता है, अनुशासन करता है, नीच कर्म- से निवारण करता है, वह सत्पुरुषोंको प्रिय होता है, और असत्पुरुषोंको अप्रिय । जेतवन छन्न (थेर) ७८-न भजे पापके मित्ते न भजे पुरिसाधमे । भजेथ मित्ते कल्याणे भजेथ पुरिसुत्तमे ॥ ३ ॥ (न भजेत् पापानि मित्राणि न भजेत् पुरुषाधमान् । भजेत् मित्राणि कल्याणानि भजेत् पुरुषानुत्तमान् ॥३॥ अनुवाद—दुष्ट मित्रोंका सेवन न करे, न अधम पुरुषोंका सेवन करे । अच्छे मित्रोंका सेवन करे, उत्तम पुरुषोंका सेवन करे । जेतवन महाकप्पिन (थेर) ७६-धम्मपीती सुखं सेति विप्पसन्नेन चेतसा । अरियप्पवेदिते धम्मे सदा रमति पण्डितो ॥ ४ ॥ (धर्मपीतीः सुखं शेते विप्रसन्नेन चेतसा । आर्यप्रवेदिते धर्मे सदा रमते पंडितः ॥४॥ ) अनुवाद—धर्म(-रस) का पान करनेवाला प्रसन्न-चित्तहो सुखपूर्वक सोता है; पंडित (जन) आर्योंके बतलाये धर्ममें सदा रमण करते हैं ।

६।७ ] पण्डितवग्गो [ ३७ जेतवन पण्डित सामणेर ८०--उदकं हि नयन्ति नेत्तिका उसुकारा नमयन्ति तेजनं । दारुं नमयन्ति तच्छका अत्तानं दमयन्ति पण्डिता ॥५॥ ( उदकं हि नयन्ति नेतृका इषुकारा नमयन्ति तेजनम् । दारु नमयन्ति, तक्षका आत्मानं दमयन्ति पण्डिताः ॥५॥ ) अनुवाद—नहरवाले पानीको लेजाते हैं, बाण बनानेवाले बाणको ठीक करते हैं, बढ़ई लकड़ीको ठीक करते हैं; और पंडित ( जन ) अपना दमन करते हैं । जेतवन भद्दिय ( थेर ) ८१-सेलो यथा एकघनो वातेन न समीरति । एवं निन्दापसंसासु न समिञ्जन्ति पण्डिता ॥६॥ ( शैलो यथैकघनो वातेन न समीर्यते । एवं निन्दाप्रशंसासु न समीर्यन्ते पण्डिताः ॥६॥ ) अनुवाद—जैसे ठोस पहाड़ हवासे कंपायमान नहीं होता; ऐसे ही पंडित निन्दा और प्रशंसासे विचलित नहीं होते । जेतवन काण-माता ८२-यथापि रहदो गम्भीरो विप्पसन्नो अनाविलो । एवं धम्मानि सुत्वान विप्पसीदन्ति पण्डिता ॥७॥

३८ ] धम्मपद [ ६।९ (यथापि ह्रदो गम्भीरो विप्रसन्नोऽनाविलः । एवं धर्मान् श्रुत्वा विप्रसीदन्ति पण्डिताः ॥७॥ ) अनुवाद—धर्मोंको सुनकर पण्डित ( जन ) अथाह, स्वच्छ, निर्मल सरोवरकी भाँति स्वच्छ ( सन्तुष्ट ) होते हैं। जेतवन पाँच सौ भिक्खु ८३—सब्बत वे सप्पुरिसा वजन्ति न कामकामा लपयन्ति सन्तो । सुखेन फुट्ठा अथवा दुखेन न उच्चावचं पण्डिता दस्सयन्ति ॥८॥ ( सर्वत्र वै सत्पुरुषा व्रजन्ति न कामकामा लपन्ति सन्तः । सुखेन स्पृष्टा अथवा दुःखेन नोच्चावचं पण्डिता दर्शयन्ति॥८॥ अनुवाद—सत्पुरुष सभी जगह जाते हैं, ( वह ) भोगोंके लिए बात नहीं चलाते; सुख मिले या दुःख, पण्डित (जन ) विकार नहीं प्रदर्शन करते । जेतवन धम्मिक ( थेर ) ८४—न अत्तहेतू न परस्स हेतु न पुत्तमिच्छे न धनं न रट्ठं । न इच्छेय्य अधम्मेन समिद्धिमत्तनो सीलवा पञ्ञवा धम्मिको सिया ॥६॥