भारतकोश
धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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२४ ] धम्मपदं [ ४१९ श्रावस्ती पाठिक ( आजीवक साधु ) ५०-न परेस विलोमानि न परेस कताकतं । अत्तनो'व अवेक्खेय्य कतानि अकतानि च ॥७॥ ( न परेषां विलोमानि न परेषां कृताकृतम् । आत्मन एव अवेक्षेत कृतानि अकृतानि च ॥ ७ ॥ ) अनुवाद-न दूसरोके विरोधी ( काम ) करे, न दूसरोंके कृत-अकृत- के खोजमें रहे, ( आदमीको चाहिये कि वह ) अपने ही कृत (=किये) और अकृत (=न किये ) की (खोज करे ) । श्रावस्ती छत्तपाणि ( उपासक ) ५१-यथापि रुचिरं पुप्फं वण्णवन्तं अगन्धकं । एवं सुभासिता वाचा अफला होति अकुब्बतो ॥८॥ ( यथापि रुचिरं पुष्पं वर्णवद् अगन्धकम् । एवं सुभाषिता वाक् अफला भवति अकुर्वतः ॥ ८ ॥ ) अनुवाद-जैसे रुचिर और वर्णयुक्त ( किन्तु ) गंधरहित फूल है, वैसे ही ( कथनानुसार ) आचरण न करनेवालेकी सुभाषित वाणी भी निष्फल है । ५२-यथापि रुचिरं पुप्फं वण्णवन्तं सगन्धकं । एवं सुभासिता वाचा सफला होति कुब्बतो ॥६॥ ( यथापि रुचिरं पुष्पं वर्णवत् सगन्धकम् । एवं सुभाषिता वाक् सफला भवति कुर्वतः ॥ ९ ॥ )

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