धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४।६ ] पुप्फवग्गो [ २३ (पुष्पाणि ह्येव प्रचिन्वन्तं व्यासक्तमनसं नरम्। सुप्तं ग्रामं महोध इव मृत्युरादाय गच्छति ॥ ४ ॥ अनुवाद-(राग आदिके) फूलोंको चुननेवाले आसक्तियुक्त मनुष्य- को मृत्यु (वैसे ही) पकड ले जाती है, जैसे सोये गाँवको बड़ी बाढ़ । श्रावस्ती पतिपूजिका ४८-पुप्फानि हेव पचिनन्तं व्यासत्तमनसं नरं । अतित्तं येव कामेसु अन्तको कुरुते वसं ॥५॥ (पुष्पाणि ह्येव प्रचिन्वन्तं व्यासक्तमनसं नरम् अतृप्तं एव कामेषु अन्तकः कुरुते वशम् ॥ ५ ॥ ) अनुवाद-(राग आदि) फूलोंको चुनते आसक्तियुक्त पुरुषको, (जब कि अभी उसने) कामोंमें तृप्ति नहीं प्राप्त की (तभी) यम (अपने) वशमें कर लेता है। श्रावस्ती (कंजूस) कोसिय सेठ ४६-यथापि भमरो पुप्फं वण्णगन्धं अहेठयं । पलेति रसमादाय एवं गामे मुनी चरे ॥६॥ (यथापि भ्रमरः पुष्पं वर्णगन्धं अघ्नन् । पलायते रसमादाय, एवं ग्रामे मुनिश्चरेत ॥ ६ ॥ ) अनुवाद-जिस प्रकार भ्रमर फूलके वर्ण और गंधको बिना हानि पहुँचाये, रसको लेकर चल देता है, वैसे ही गाँवमें मुनि विचरण करे।