धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ ] धम्मपदं [ ५।१२ ( मध्विव मन्यते बालो यावत् पापं न पच्यते । यदा च पच्यते पापं अथ दुःखं निगच्छति ॥१०॥ ) अनुवाद—अज्ञ ( जन ) जब तक पापका परिपाक नहीं होता, तब तक उसे मधुके समान जानता है। जब पापका परिपाक होता है, तो दुखी होता है। राजगृह ( वेणुवन ) जम्बुक ( आजीवक साधु ) ७०-मासे मासे कुसग्गेन बालो भुञ्जेथ भोजनं । न सो संखतधम्मानं कलं अग्घति सोळसिं ॥११॥ ( मासे मासे कुशाग्रेण बालो भुंजीत भोजनम् । न स संख्यातधर्माणां कलामर्हति षोडशीम् ॥११॥) अनुवाद—यदि अज्ञ ( पुरुष ) कुशकी नोकसे महीने महीनेपर खाना खाये, तो भी धर्मके जानकारोके सोलहवें भागके भी बराबर ( वह तप ) नहीं हो सकता । राजगृह ( वेणुवन ) अहिपेत ७१-न हि पापं कतं कम्मं सञ्जु खीरं 'व मुच्चति । डहन्तं बालमन्वेति भस्माच्छन्नो 'व पावको ॥१२॥ ( नहि पापं कृतं कर्म सद्यः क्षीरमिव मुंचति । दहन् बालमन्वेति भस्माच्छन्न इव पावकः ॥१२॥) अनुवाद—ताजे दूधकी भाँति किया पाप कर्म, ( तुरन्त ) विकार नहीं लाता, वह भस्मसे ढँकी आगकी भाँति दग्ध करता अज्ञजनका पीछा करता है।