भारतकोश
धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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४।१६ ] पुप्फवग्गो [ २७ (तेषां सम्पन्नशीलानां अप्रमाद-विहारिणाम् । सम्यग्-ज्ञा-विमुक्तानां मारो मार्गं न विन्दति ॥१४॥ ) अनुवाद—( जो ) वे सदाचारी निरालस हो विहरनेवाले, यथार्थ ज्ञान द्वारा मुक्त ( हो गये हैं ), ( उनके ) मार्गको मार नहीं पकड सकता । जेतवन गरहादिन्न ५८-यथा संकारधानस्मिं उज्झितस्मिं महापथे । पदुमं तत्थ जायेथ सुचिगन्धं मनोरमं ॥१५॥ ( यथा संकारधान उज्झिते महापथे । पद्म तत्र जायेत शुचिगन्धं मनोरमम् ॥१५॥ ) ५६-एवं संकारभूतेसु अन्धभूते पृथुज्जने । अतिरोचति पञ्ञाय सम्मासम्बुद्धसावको ॥१६॥ ( एवं संकारभूते अन्धभूते पृथग्जने । अतिरोचते प्रज्ञया सम्यक्-संबुद्ध-श्रावकः ॥१६॥ ) अनुवाद—जैसे महापथपर फेंके कूड़ेके ढेरपर मनोरम, शुचिगंध, गुलाब ( =पद्म ) उत्पन्न होवे, इसी प्रकार कूड़े समान अन्धे अज्ञजनों ( =पृथग्-जनों ) में सम्यक्-संबुद्ध ( =यथार्थ ज्ञानी ) का अनुगामी ( अपनी ) प्रज्ञासे प्रकाशमान होता है । ४-पुष्पवर्ग समाप्त

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