धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ ] धम्मपदं [ ४।१४ अनुवाद—फूलकी सुगंध हवासे उलटी ओर नहीं जाती, न चन्दन, तगर या चमेली (की गंध ही वैसा करती है); किन्तु सज्जनोंकी सुगंध हवासे उलटी ओर जाती है, सत्पुरुष सभी दिशाओंमें (सुगंध) बहाते हैं। ५५-चन्दनं तगरं वापि उप्पलं अथ वस्सिकी। एतेसं गन्धजातानं सीलगन्धो अनुत्तरो ॥१२॥ (चन्दनं तगरं वापि उत्पलं अथ वार्षिकी। एतेषां गन्धजातानां शीलगन्धोऽनुत्तरः ॥१२॥) अनुवाद—चन्दन या तगर, कमल या जूही, इन सभी (की) सुगंधों- से सदाचारकी सुगंध उत्तम है। राजगृह (वेणुवन) महाकस्सप ५६—अप्पमत्तो अयं गन्धो या'यं तगरचन्दनी। यो च सीलवतं गन्धो वाति देवेसु उत्तमो ॥१३॥ (अल्पमात्रोऽयं गन्धो योऽयं तगरचन्दनी। यश्च शीलवतां गन्धो वाति देवेषु उत्तमः ॥१३॥) अनुवाद—तगर और चन्दनकी जो यह गंध फैलती है, वह अल्प- मात्र है; और जो यह सदाचारियोंकी गंध है, (वह) उत्तम (गंध) देवताओंमें फैलती है। राजगृह (वेणुवन) गोधिक (थेर) ५७-तेसं सम्पन्नसीलानं अप्पमादविहारिनं । सम्मदञ्ञाविमुत्तानं मारो मग्गं न विन्दति ॥१४॥