भारतकोश
धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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३१९ ] चित्तवग्गो [ १९ श्रावस्ती पाँच सौ विपश्यक भिक्षु ४०—कुम्भूपमं कायमिमं विदित्वा नगरूपमं चित्तमिदं ठपेत्वा । योधेथ मारं पञ्ञायुधेन जितं च रक्खे अनिवेसनो सिया ॥८॥ ( कुम्भोपमं कायमिमं विदित्वा नगरोपमं चित्तमिदं स्थापयित्वा । युध्येत मारं प्रज्ञायुधेन जितं च रक्षेत् अनिवेशनः स्यात् ॥८॥ ) अनुवाद—इस शरीरको घड़ेके समान ( भंगुर ) जान, इस चित्तको गढ़ (=नगर)के, समान क़ायम कर, प्रज्ञारूपी हथियारसे मारसे युद्ध करे । जीतनेके बाद ( अपनी ) रक्षा करे, ( तथा ) आसक्तिरहित होवे । श्रावस्ती पूतिगत्त तिस्स ( थेर ) ४१—अचिरं वत'यं कायो पठविं अधिसिस्सति । छुड्डो अपेतविञ्ञाणो निरत्थं 'व कलिङ्गरं ॥६॥ ( अचिरं बतायं कायः पृथिवीं अधिशेष्यते । क्षुद्रोऽपेतविज्ञानो निरर्थ इव कलिङ्गरम् ॥९॥ ) अनुवाद—अहो ! यह तुच्छ शरीर शीघ्र ही चेतनारहित हो निरर्थक काठकी भाँति पृथिवीपर पड़ रहेगा ।

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