भारतकोश
धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 213 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 49

३८ ] धम्मपद [ ६।९ (यथापि ह्रदो गम्भीरो विप्रसन्नोऽनाविलः । एवं धर्मान् श्रुत्वा विप्रसीदन्ति पण्डिताः ॥७॥ ) अनुवाद—धर्मोंको सुनकर पण्डित ( जन ) अथाह, स्वच्छ, निर्मल सरोवरकी भाँति स्वच्छ ( सन्तुष्ट ) होते हैं। जेतवन पाँच सौ भिक्खु ८३—सब्बत वे सप्पुरिसा वजन्ति न कामकामा लपयन्ति सन्तो । सुखेन फुट्ठा अथवा दुखेन न उच्चावचं पण्डिता दस्सयन्ति ॥८॥ ( सर्वत्र वै सत्पुरुषा व्रजन्ति न कामकामा लपन्ति सन्तः । सुखेन स्पृष्टा अथवा दुःखेन नोच्चावचं पण्डिता दर्शयन्ति॥८॥ अनुवाद—सत्पुरुष सभी जगह जाते हैं, ( वह ) भोगोंके लिए बात नहीं चलाते; सुख मिले या दुःख, पण्डित (जन ) विकार नहीं प्रदर्शन करते । जेतवन धम्मिक ( थेर ) ८४—न अत्तहेतू न परस्स हेतु न पुत्तमिच्छे न धनं न रट्ठं । न इच्छेय्य अधम्मेन समिद्धिमत्तनो सीलवा पञ्ञवा धम्मिको सिया ॥६॥