धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६।७ ] पण्डितवग्गो [ ३७ जेतवन पण्डित सामणेर ८०--उदकं हि नयन्ति नेत्तिका उसुकारा नमयन्ति तेजनं । दारुं नमयन्ति तच्छका अत्तानं दमयन्ति पण्डिता ॥५॥ ( उदकं हि नयन्ति नेतृका इषुकारा नमयन्ति तेजनम् । दारु नमयन्ति, तक्षका आत्मानं दमयन्ति पण्डिताः ॥५॥ ) अनुवाद—नहरवाले पानीको लेजाते हैं, बाण बनानेवाले बाणको ठीक करते हैं, बढ़ई लकड़ीको ठीक करते हैं; और पंडित ( जन ) अपना दमन करते हैं । जेतवन भद्दिय ( थेर ) ८१-सेलो यथा एकघनो वातेन न समीरति । एवं निन्दापसंसासु न समिञ्जन्ति पण्डिता ॥६॥ ( शैलो यथैकघनो वातेन न समीर्यते । एवं निन्दाप्रशंसासु न समीर्यन्ते पण्डिताः ॥६॥ ) अनुवाद—जैसे ठोस पहाड़ हवासे कंपायमान नहीं होता; ऐसे ही पंडित निन्दा और प्रशंसासे विचलित नहीं होते । जेतवन काण-माता ८२-यथापि रहदो गम्भीरो विप्पसन्नो अनाविलो । एवं धम्मानि सुत्वान विप्पसीदन्ति पण्डिता ॥७॥