भारतकोश
धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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१६ ] धम्मपदं [ ६।४ (अववदेदनुशिष्याद् असभ्याच्च निवारयेत् । सतां हि स प्रियो भवति असतां भवत्यप्रियः ॥ २॥ ) अनुवाद—(जो) सदुपदेश देता है, अनुशासन करता है, नीच कर्म- से निवारण करता है, वह सत्पुरुषोंको प्रिय होता है, और असत्पुरुषोंको अप्रिय । जेतवन छन्न (थेर) ७८-न भजे पापके मित्ते न भजे पुरिसाधमे । भजेथ मित्ते कल्याणे भजेथ पुरिसुत्तमे ॥ ३ ॥ (न भजेत् पापानि मित्राणि न भजेत् पुरुषाधमान् । भजेत् मित्राणि कल्याणानि भजेत् पुरुषानुत्तमान् ॥३॥ अनुवाद—दुष्ट मित्रोंका सेवन न करे, न अधम पुरुषोंका सेवन करे । अच्छे मित्रोंका सेवन करे, उत्तम पुरुषोंका सेवन करे । जेतवन महाकप्पिन (थेर) ७६-धम्मपीती सुखं सेति विप्पसन्नेन चेतसा । अरियप्पवेदिते धम्मे सदा रमति पण्डितो ॥ ४ ॥ (धर्मपीतीः सुखं शेते विप्रसन्नेन चेतसा । आर्यप्रवेदिते धर्मे सदा रमते पंडितः ॥४॥ ) अनुवाद—धर्म(-रस) का पान करनेवाला प्रसन्न-चित्तहो सुखपूर्वक सोता है; पंडित (जन) आर्योंके बतलाये धर्ममें सदा रमण करते हैं ।