दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०४ दोहावली चातकके चित्तमें रहनेवाले प्रेमके लिये अनुकूल हो जाय। (अर्थात् स्वाति-नक्षत्रके जलसे हृदयमें लगी हुई प्रेम वृक्षकी जड़ भलीभाँति सींची जाय, जिससे प्रेम-वृक्ष फूल-फलकर लहलहा उठे) ॥३०६॥ उष्ण काल अरु देह खिन मग पंथी तन ऊख । चातक बतियाँ ना रुचीं अन जल सींचें रूख ॥३१०॥ भावार्थ—गर्मियोंके दिन थे, चातक शरीरसे खिन्न था (थका हुआ था), रास्ते चल रहा था, उसका शरीर बहुत गरम हो रहा था [इतनेमें उसे कुछ पेड़ दीख पड़े, मनमें आया कि जरा विश्राम कर लूं] परंतु अनन्य प्रेमी चातकको मनकी यह बात अच्छी नहीं लगी; क्योंकि वे वृक्ष [स्वाति-नक्षत्रके जलसे सींचे हुए न होकर] दूसरे ही जलसे सींचे हुए थे ॥३१०॥ अन जल सींचे रूख की-छाया तें बरु घाम । तुलसी चातक बहुत हैं यह प्रबीन को काम ॥३११॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि यों चातक (चातक- प्रेमका दम भरनेवाले) बहुत हैं, परंतु ‘स्वातीके जलके अतिरिक्त अन्य जलसे सींचे हुए वृक्षकी छायासे तो धूप ही अच्छी' ऐसा मानना तो किसी [प्रेम-प्रणको निबाहनेमें] चतुर चातक (सच्चे प्रेमी) का ही काम है ॥३११॥ एक अंग जो सनेहता निसि दिन चातक नेह । तुलसी जासों हित लगै वहि अहार वहि देह ॥३१२॥ भावार्थ—चातकका जो रात-दिनका (नित्य-चौबीसों घंटेका) प्रेम है, वही एकाङ्गी प्रेम है।* तुलसीदासजी कहते हैं, ऐसा एकाङ्गी *एकाङ्गी प्रेम उसे कहते हैं, जिसमें प्रेमी यह नहीं देखता कि प्रेमास्पद उसके बदलेमें प्रेम करता है या नहीं।