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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

by गोस्वामी तुलसीदास

DevanagariHindipublished196 pages

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६८ दोहावली रघुबर कीरति सज्जननि सीतल खलनि सुताति । ज्यों चकोर चय चक्कवनि तुलसी चाँदनि राति ॥१९४॥ भावार्थ—जिस प्रकार चाँदनी रात चकोरोंके समूहके लिए शान्तिदायिनी और चकवोंके लिये विशेष ताप देनेवाली होती है, तुलसीदासजी कहते हैं कि उसी प्रकार श्रीरघुनाथजीकी कीर्ति सज्जनोंके लिये शीतल [सुख देनेवाली] और दुर्जनोंको विशेष जलानेवाली होती है ॥ १६४ ॥ रामकथाकी महिमा राम कथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु । तुलसी सुभग सुनेह बन सिय रघुबीर बिहारु ॥१९५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामजीकी कथा मन्दा- किनी नदी है, सुन्दर [भक्तिसे पूर्ण निर्दोष] चित्त चित्रकूट है और स्नेह ही सुन्दर वन है, जिसमें श्रीसीतारामजी विहार करते हैं ॥ १६५ ॥ स्याम सुरभि पय बिसद अति गुनद करहिं सब पान । गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान ॥१९६॥ भावार्थ—श्यामा (कजली) गौ काली होनेपर भी उसका दूध बहुत उज्ज्वल और गुणदायक होता है, इसीसे लोग उसे [बड़े चावसे] पीते हैं। इसी प्रकार बुद्धिमान् संतजन [श्रीसीतारामजीके यशको गँवारू भाषामें होनेपर भी [बड़े चावसे] गाते और सुनते हैं ॥१६६॥ हरि हर जस सुर नर गिरहुँ बरनहिं सुकबि समाज । हाँड़ी हाटक घटित चरु रांधें स्वाद सुनाज ॥१९७॥ भावार्थ—सुकविगण भगवान् श्रीहरि और भगवान् श्रीशंकरके