दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
by गोस्वामी तुलसीदास
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Read in contextदोहावली ६९ यशको संस्कृत और भाषा दोनोंमें ही वर्णन करते हैं। उत्तम अनाज- को चाहे मिट्टीकी हाँडीमें पकाया जाय, चाहे सोनेके पात्रमें, वह स्वादिष्ट ही होता है ॥ १६७ ॥ राममहिमाकी अज्ञेयता तिल पर राखेउ सकल जग विदित बिलोकत लोग । तुलसी महिमा राम की कौन जानिबे जोग ॥१६८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामजीकी महिमाको [पूर्णरूपसे] जाननेका अधिकारी कौन है ? (अर्थात् कोई नहीं है।) उन्होंने आँखके काले तिल (पुतली) पर सारे जगत्को रख दिया है, इस बातको सब लोग जानते हैं और प्रत्यक्ष देखते हैं (आँखोंका छोटा-सा तिल यदि बिगड़ जाय तो इतना भारी विस्तृत जगत् जरा-सा भी नहीं दीख पड़ता) ॥ १६८ ॥ श्रीरामजीके स्वरूपकी अलौकिकता सोरठा राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर । अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह ॥१६९॥ भावार्थ—हे रामजी ! आपका स्वरूप वाणीके अगोचर और बुद्धिसे परे है। इस स्वरूपको न कोई जान पाया है, न बखान कर सकता है, न उसका पार ही पा सकता है; इसलिये वेद सदा ‘नेति-नेति’ कहकर उसका वर्णन करते हैं ॥ १६९ ॥ ईश्वर-महिमा दोहा माया जीव सुभाव गुन काल करम महदादि । ईस अंक तें बढ़त सब ईस अंक बिनु बादि ॥२००॥ CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri