दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
by गोस्वामी तुलसीदास
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Read in context७० दोहावली भावार्थ—माया, जीव, स्वभाव, गुण, काल, कर्म और महत्त्वादि सब ईश्वररूपी अङ्कके संयोगसे बढ़ते हैं और उस अङ्कके बिना व्यर्थ हो जाते हैं ॥ २०० ॥ श्रीरामजीकी भक्तवत्सलता हित उदास रघुबर बिरह बिकल सकल नर नारि। भरत लखन सिय गति समुझि प्रभु दृग सदा सुबारि ॥२०१॥ भावार्थ—श्रीरघुनाथजीके विरहमें उनके मित्र उदासीन, सभी स्त्री-पुरुष व्याकुल थे; परंतु श्रीभरतजी, श्रीलक्ष्मणजी और श्रीसीता- जीकी दशाको समझकर तो प्रभु श्रीरामजीके नेत्रोंमें भी सदा आँसू भरे रहते थे (अर्थात् समस्त अवधवासी तो श्रीरामजीके कष्टसे दुःखी थे; परंतु स्वयं श्रीरामजी भरतजी, लक्ष्मणजी और सीताजीके दुःखसे दुःखित रहते थे) ॥ २०१ ॥ सीता, लक्ष्मण और भरतके रामप्रेमकी अलौकिकता सीय सुमित्रा सुवन गति भरत सनेह सुभाउ । कहिबे को सारद सरस जनिबे को रघुराउ ॥२०२॥ भावार्थ—श्रीसीताजी तथा श्रीलक्ष्मणजीकी अनन्य प्रेमकी चाल और श्रीभरतजीके प्रेम और स्वभावको कहनेके लिए केवल सरस्वती- जी ही समर्थ हैं और जाननेके लिये केवल श्रीरघुनाथजी ही ॥२०२॥ जानी राम न कहि सके भरत लखन सिय प्रीति । सो सुनि गुनि तुलसी कहत हठ सठता की रीति ॥२०३॥ भावार्थ—श्रीभरतजी, श्रीलक्ष्मणजी और श्रीसीताजीके प्रेमको श्रीरामचन्द्रजी ही जान सके; पर वे भी उसका वर्णन नहीं कर सके। इस वातको सुनकर और विचारकर भी तुलसीदास हठवश उनके