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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

by गोस्वामी तुलसीदास

DevanagariHindipublished196 pages

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दोहावली ७१ प्रेमका वर्णन करने चला है, यह उसकी दुष्टता और मूर्खताकी ही निशानी है॥ २०३ ॥ सब बिधि समरथ सकल कह सहि साँसति दिन राति। भलो निबाहेउ सुनि समुझि स्वामिधर्म सब भाँति ॥२०४॥ भावार्थ—प्रेमके तत्त्वको जानने और निवाहनेमें श्रीरामजी ही सब प्रकारसे समर्थ हैं, सब लोग यही कहते हैं। इसीके अनुसार उन्होंने सब कुछ सुन-समझकर दिन-रात कष्ट सहते हुए अपने स्वामि- धर्मको सब प्रकारसे भलीभाँति निबाहा ! (सीताको वन-वन ढूंढ़ते फिरे, लक्ष्मणके लिये कितना विलाप किया और भरतको तो कभी चित्तसे हटाया ही नहीं—भरतकी प्रशंसा स्वयं निम्नलिखित शब्दोंमें की ॥ २०४ ॥ भरत-महिमा भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरिहर पद पाइ। कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ ॥२०५॥ भावार्थ—[अयोध्याके राज्यकी तो बात ही क्या है] ब्रह्मा, विष्णु और महेशका पद पाकर भी भरतको राजमद नहीं हो सकता। काँजीकी बूंदोंसे भला क्या कभी क्षीरसागर नष्ट हो सकता है (फट सकता है) ? ॥ २०५ ॥ संपति चकई भरत चक मुनि आयसु खेलवार। तेहि निसि आश्रम पिँजराँ राखे भा भिनुसार ॥२०६॥ भावार्थ—[भरद्वाजजीके योगबलसे जुटायी हुई] भोग-विलासकी सामग्री मानो चकवी है और भरतजी चकवा हैं तथा भरद्वाज मुनिकी आज्ञा खिलाड़ी है, जिसने उस रातको आश्रमरूपी पिंजड़ेमें CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri