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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

by गोस्वामी तुलसीदास

DevanagariHindipublished196 pages

प्रारंभिक पृष्ठ एवं मंगलाचरण

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२.२ गोस्वामी तुलसीदासजी रचित दोहावली अनुवादक हनुमान प्रसाद पोद्दार मूल्य एक रुपया पचास पैसे जावक क्रमांक ११४६..................

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गोस्वामी तुलसीदासजी रचित दोहावली अनुवादक हनुमानप्रसाद पोद्दार ॐ मुमुक्षु भवन, वेद वेदाङ्ग पुस्तकालय ॐ वाराणसी। २६-८५ आगत क्रमांक........................... दिनांक..................................

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प्रकाशक—गोविन्द भवन कार्यालय, गीता प्रेस, गोरखपुर सं० १६६६ से २०३७ तक ४,०४,२५० सं० २०३८ तेईसवाँ संस्करण २०,००० सं० २०३९ चौबीसवाँ संस्करण २५,००० कुल ४,४९,२५० चार लाख उनचास हजार दो सौ पचास मूल्य रु० १.५० पैसे (एक रुपया पचास पैसे) पता—गीताप्रेस, पो० गीताप्रेस (गोरखपुर) मुद्रक—हिन्दुस्तानी आर्ट कॉटेज, गणेशगंज, लखनऊ फोन 46715

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ॐ मुमुक्षु भवन : वेद वेदाङ्ग पुस्तकालय ॐ वाराणसी ३६८२ आगत क्रमांक..................... दिनांक..................... श्रीहरिः नम्र निवेदन दोहावली प्रातःस्मरणीय भक्तकुल-चूड़ामणि गोस्वामी तुलसी- दासजीकी प्रमुख कृतियोंमें है और भक्त-समाजमें इसका बहुत आदर है। गोस्वामीजीने अपनी अनुभूतियोंको बड़े ही भावपूर्ण दोहोंमें व्यक्त किया है। भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, सदाचार, प्रेम, नीति आदि विविध विषयोंपर इतने सरस दोहे गोस्वामीजीकी कृतियोंके अतिरिक्त शायद ही कहीं मिलें। भक्तकी प्रासादिक वाणीका आनन्द और मिल ही कहाँ सकता है ? भगवान्‌की असीम अनुकम्पासे ही उनके भक्तोंकी अमृतवाणीके रसास्वादनका सौभाग्य प्राप्त होता है। दोहावलीकी टीका लिखते समय मेरा कुछ समय श्रीरामचर्चामें बीता, इसका मुझे अपार आनन्द एवं परम संतोष है। वस्तुतः जितना समय भगवान् और उनके भक्तोंकी चर्चामें बीते उतना ही समय सफल एवं सार्थक समझा जाना चाहिये। टीका लिखते समय स्थान-स्थानपर स्वर्गीय लाला भगवानदीनकी टीकासे सहायता ली गयी है। जिसका आभार हम सविनय स्वीकार करते हैं। मेरे सम्मान्य पं० श्रीचिम्मनलालजी

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[ ४ ] गोस्वामी, एम० ए०, शास्त्रीने टीकाको आदिसे अन्ततक देखा है तथा यथास्थान सुधारा और सँवारा है। उनके साथ मेरा प्रेमका सम्बन्ध है, अतएव उनके प्रति कृतज्ञता-ज्ञापन स्वयं मेरी ही दृष्टिमें अक्षम्य है। इस टीकामें जो कुछ त्रुटि या दोष दीख पड़ें, विज्ञ पाठक- पाठिकाएँ कृपापूर्वक मुझे सूचित कर दें तो अगले संस्करणमें सुधारा जा सकता है। संत, विद्वान् और महात्मागण मेरी इस धृष्टताके लिये क्षमा प्रदान करें। विनीत अनुवादक

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श्रीहरिः विषय-सूची विषय ~ पृष्ठ-संख्या १—ध्यान १३ २—राम-नाम-जपकी महिमा १४ ३—रामप्रेमके बिना सब व्यर्थ है २४ ४—प्रार्थना २६ ५—रामकी और रामप्रेमकी महिमा २६ ६—उद्बोधन २८ ७—तुलसीदासजीकी अभिलाषा २९ ८—रामप्रेमकी महत्ता ३० ९—रामविमुखताका कुफल ३१ १०—कल्याणका सुगम उपाय ३५ ११—श्रीरामजीकी प्राप्तिका सुगम उपाय ३६ १२—रामप्रेमके लिये वैराग्यकी आवश्यकता ३६ १३—शरणागतिकी महिमा ३७ १४—भक्तिका स्वरूप ३८ १५—कलियुगसे कौन नहीं छला जाता ? ३८ १६—गोस्वामीजीकी प्रेम-कामना ३८ १७—रामभक्तके लक्षण ४० १८—उद्बोधन ४० विषय ~ पृष्ठ-संख्या १९—शिव और रामकी एकता ४२ २०—रामप्रेमकी सर्वोत्कृष्टता ४३ २१—श्रीरामकी कृपा ४३ २२—भगवान्‌की बाललीला ४६ २३—प्रार्थना ४८ २४—भजनकी महिमा ४९ २५—रामसेवककी महिमा ५२ २६—राममहिमा ५४ २७—रामभजनकी महिमा ५५ २८—रामप्रेमकी प्राप्तिका सुगम उपाय ५५ २९—रामप्राप्तिमें बाधक ५६ ३०—रामकी अनुकूलतामें ही कल्याण है ५६ ३१—श्रीरामकी शरणागत- वत्सलता ५७ ३२—प्रार्थना ६३ ३३—रामराज्यकी महिमा ६४ ३४—श्रीरामकी दयालुता ६६ ३५—श्रीरामकी धर्मधुरन्धरता ६६ ३६—श्रीसीताजीका अलौकिक प्रेम ६६ ३७—श्रीरामकी कीर्ति ६७ ३८—रामकथाकी महिमा ६८

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[ ६ ] विषय पृष्ठ-संख्या ३९—राममहिमाकी अज्ञेयता ६९ ४०—श्रीरामजीके स्वरूपकी अलौकिकता ६९ ४१—ईश्वरमहिमा ६९ ४२—श्रीरामजीकी भक्तवत्सलता ७० ४३—सीता, लक्ष्मण और भरतके रामप्रेमकी अलौकिकता ७० ४४—भरत-महिमा ७१ ४५—लक्ष्मण-महिमा ७३ ४६—शत्रुघ्न-महिमा ७३ ४७—कौसल्या-महिमा ७४ ४८—सुमित्रा-महिमा ७४ ४९—सीता-महिमा ७४ ५०—रामचरित्रकी पवित्रता ७४ ५१—कैकेयीकी कुटिलता ७५ ५२—दशरथ-महिमा ७५ ५३—जटायुका भाग्य ७७ ५४—रामकृपाकी महत्ता ७८ ५५—हनुमत्स्मरणकी महत्ता ७८ ५६—बाहुपीड़ाकी शान्तिके लिये प्रार्थना ८० ५७—काशी-महिमा ८१ ५८—शंकर-महिमा ८१ ५९—शंकरजीसे प्रार्थना ८१ ६०—भगवल्लीलाकी दुर्ज्ञेयता ८२ ६१—प्रेममें प्रपञ्च बाधक है ८२ विषय पृष्ठ-संख्या ६२—अभिमान ही बन्धनका मूल है ८२ ६३—जीव और दर्पणके प्रति- बिम्बकी समानता ८३ ६४—भगवन्मायाकी दुर्ज्ञेयता ८३ ६५—जीवकी तीन दशाएँ ८४ ६६—सृष्टि स्वप्नवत् है ८४ ६७—हमारी मृत्यु प्रतिक्षण हो रही है ८४ ६८—कालकी करतूत ८५ ६९—इन्द्रियोंकी सार्थकता ८५ ७०—सगुणके बिना निर्गुणका निरूपण असम्भव है ८५ ७१—निर्गुणकी अपेक्षा सगुण अधिक प्रामाणिक है ८६ ७२—विषयासक्तिका नाश हुए बिना ज्ञान अधूरा है ८६ ७३—विषयासक्त साधुकी अपेक्षा वैराग्यवान् गृहस्थ अच्छा है ८७ ७४—साधुके लिये पूर्ण त्यागकी आवश्यकता ८७ ७५—भगवत्प्रेममें आसक्ति बाधक है; गृहस्थाश्रम नहीं ८८ ७६—सन्तोषपूर्वक घरमें रहना ही उत्तम है ८८

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[ ७ ] विषय पृष्ठ-संख्या | विषय पृष्ठ-संख्या ७७—विषयोंकी आशा ही | ६२—ज्ञानमार्गकी कठिनता ९३ दुःखका मूल है ८८ | ९३—भगवद्भजनके अतिरिक्त ७८—मोहमहिमा ८६ | और सब प्रयत्न व्यर्थ है ६३ ७६—विषय-सुखकी हेयता ८६ | ९४—संतोषकी महिमा ६४ ८०—लोभकी प्रबलता ८६ | ९५—मायाकी प्रबलता और ८१—धन और ऐश्वर्यके मद | उसके तरनेका उपाय ६४ तथा कामकी व्यापकता ६० | ६६—गोस्वामीजीकी अनन्यता ९४ ८२—मायाकी फौज ६० | ६७—प्रेमकी अनन्यताके लिये ८३—काम, क्रोध, लोभकी | ॰चातकका उदाहरण ६५ प्रबलता ६० | ९८—एकाङ्गी अनुरागके अन्य ८४—काम, क्रोध, लोभके | उदाहरण १०५ सहायक ६० | ६६—मृगका उदाहरण १०५ ८५—मोहकी सेना ६१ | १००—सर्पका उदाहरण १०५ ८६—अग्नि, समुद्र, प्रबल स्त्री | १०१—कमलका उदाहरण १०६ और कालकी समानता ६१ | १०२—मछलीका उदाहरण १०६ ८७—स्त्री झगड़े और मृत्युकी | १०३—मयूरशिखा बूटीका जड़ है ६१ | उदाहरण १०७ ८८—उद्बोधन ६२ | १०४—अनन्यताकी महिमा १०८ ८६—गृहासक्ति श्रीरघुनाथजी- | १०५—गाढ़े दिनका मित्र ही के स्वरूपके ज्ञानमें | मित्र है १०८ बाधक है ६२ | १०६—बराबरीका स्नेह दुःख- ६०—काम-क्रोधादि एक-एक | दायक होता है १०६ अनर्थकारक हैं, फिर | १०७—मित्रतामें छल बाधक है १०६ सबकी तो बात ही क्या ? ६२ | १०८—वैर और प्रेम अंधे ६१—किसके

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[ ८ ] विषय पृष्ठ-संख्या १०९—दानी और याचकका स्वभाव ११० ११०—प्रेम और बैर ही अनुकूलता और प्रति- कूलतामें हेतु हैं १११ १११—स्मरण और . प्रिय- भाषण ही प्रेमकी निशानी है १११ ११२—स्वार्थ ही अच्छाई- बुराईका मानदण्ड है १११ ११३—संसारमें प्रेममार्गके अधिकारी बिरले ही हैं ११२ ११४—कलियुगमें कपटकी प्रधानता ११२ ११५—कपट अन्ततक नहीं निभता ११३ ११६—कुटिल मनुष्य अपनी कुटिलताको नहीं छोड़ सकता ११३ ११७—स्वभावकी प्रधानता ११४ ११८—सत्सङ्ग और असत्सङ्गका परिणामगत भेद ११५ ११९—सज्जन और दुर्जनका भेद ११६ १२०—अवसरकी प्रधानता ११६ १२१—भलाई करना बिरले ही जानते हैं ११७ विषय पृष्ठ-संख्या १२२—संसारमें हित करने- वाले कम हैं ११७ १२३—वस्तु ही प्रधान है, आधार नहीं. ११८ १२४—प्रीति और बैरकी तीन श्रेणियाँ ११९ १२५—जिसे सज्जन ग्रहण करते हैं, उसे दुर्जन त्याग देते हैं ११९ १२६—प्रकृतिके अनुसार व्यवहारका भेद भी आवश्यक है १२० १२७—अपना आचरण सभी- को अच्छा लगता है १२० १२८—भाग्यवान् कौन है ? १२० १२९—साधुजन किसकी सराहना करते हैं ? १२१ १३०—सङ्गकी महिमा १२१ १३१—मार्गभेदसे फलभेद १२४ १३२—भलेके भला ही हो, यह नियम नहीं है १२४ १३३—विवेककी आवश्यकता १२४ १३४—कभी-कभी भलेको बुराई भी मिल जाती है १२५ १३५—सज्जन और दुर्जनकी परीक्षाके भिन्न-भिन्न प्रकार १२६

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[ ६ ]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
१३६—नीच पुरुषकी नीचता१२६१५०—भूप-दरबारकी निन्दा१३१
१३७—सज्जनकी सज्जनता१२६१५१—छल-कपट सर्वत्र
१३८—नीचनिन्दा१२७वर्जित है१३२
१३९—सज्जन-महिमा१२८१५२—जगत्में सब सीधोंको
१४०—दुर्जनोंका स्वभाव१२८तंग करते हैं१३३
१४१—नीचकी निन्दासे उत्तम१५३—दुष्टनिन्दा१३३
पुरुषोंका कुछ नहीं१५४—कपटीको पहचानना
घटता१२८बड़ा कठिन है१३७
१४२—गुणोंका ही मूल्य है.१५५—कपटीसे सदा डरना
दूसरोंके आदर-चाहिये१३७
अनादरका नहीं१२९१५६—कपट ही दुष्टताका
१४३—श्रेष्ठ पुरुषोंकी महिमा-स्वरूप है१३८
को कोई नहीं पा सकता१२९१५७—कपटी कभी सुख नहीं
१४४—दुष्ट पुरुषोंद्वारा की हुईपाता१३८
निन्दा-स्तुतिका कोई१५८—पापही दुःखका मूल है१३८
मूल्य नहीं है१२९१५९—अविवेक ही दुःखका
१४५—डाह करनेवालोंका कभीमूल है१३९
कल्याण नहीं होता१३०१६०—विपरीत बुद्धि विनाश-
१४६—दूसरोंकी निन्दा करने-का लक्षण है१४०
वालोंका मुंह काला१६१—जोशमें आकर अनधि-
होता है१३०कार कार्य करनेवाला
१४७—मिथ्या अभिमानकापछताता है१४१
दुष्परिणाम१३०१६२—समयपर कष्ट सह लेना
१४८—नीचा बनकर रहनाहितकर होता है१४१
ही श्रेष्ठ है१३११६३—भगवान् सबके रक्षक हैं१४२
१४९—सज्जन स्वाभाविक ही१६४—लड़ना सर्वथा त्याज्य है१४२
पूजनीय होते हैं१३१
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[ १० ] विषय पृष्ठ-संख्या १६५—क्षमाका महत्त्व १४३ १६६—क्रोधकी अपेक्षा प्रेमके द्वारा वशमें करना ही जीत है १४३ १६७—वीतराग पुरुषोंकी शरण ही जगत्‌के जंजालसे बचनेका उपाय है १४६ १६८—शूरवीर करनी करते हैं, कहते नहीं १४६ १६९—अभिमानके वचन कहना अच्छा नहीं १४७ १७०—दीनोंकी रक्षा करने- वाला सदा विजयी होता है १४७ १७१—नीतिका पालन करने- वालेके सभी सहायक बन जाते हैं १४७ १७२—सराहने योग्य कौन है ? १४८ १७३—अवसरपर चूक जानेसे बड़ी हानि होती है १४८ १७४—समयका महत्त्व १४६ १७५—विपत्तिकालके मित्र कौन हैं ? १४६ १७६—होनहारकी प्रबलता १५० १७७—परमार्थप्राप्तिके चार उपाय १५१ विषय पृष्ठ-संख्या १७८—विवेककी आवश्यकता १५१ १७९—विश्वासकी महिमा १५१ १८०—बारह नक्षत्र व्यापारके लिये अच्छे हैं १५२ १८१—चौदह नक्षत्रोंमें हाथसे गया हुआ धन वापस नहीं मिलता १५३ १८२—कौन-सी तिथियाँ कब हानिकारक होती हैं १५३ १८३—कौन-सा चन्द्रमा घातक समझना चाहिये ? १५४ १८४—किन-किन वस्तुओंका दर्शन शुभ है ? १५४ १८५—सात वस्तुएँ सदा मङ्गलकारी हैं १५४ १८६—श्रीरघुनाथजीका स्मरण सारे मङ्गलोंकी जड़ है १५४ १८७—यात्राके समयका शुभ स्मरण १५५ १८८—वेदकी अपार महिमा १५५ १८९—धर्मका परित्याग किसी भी हालतमें नहीं करना चाहिये १५६ १९०—दूसरेका हित ही करना चाहिये, अहित नहीं १५६ १९१—प्रत्येक कार्यकी सिद्धिमें तीन सहायक होते हैं १५६

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[ ११ ] विषय पृष्ठ-संख्या १६२-नीतिका अवलम्बन और श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम ही श्रेष्ठ है १५७ १६३-विवेकपूर्वक व्यवहार ही उत्तम है १५७ १६४-नेमसे प्रेम बड़ा है १५८ १६५-किस-किसका परित्याग कर देना चाहिये १५८ १६६-सात वस्तुओंको रस बिगड़नेसे पहले ही छोड़ देना चाहिये १५८ १६७-मनके चार कण्टक हैं १५९ १६८-कौन निरादर पाते हैं? १६० १६९-पाँच दुःखदायी होते हैं १६० २००-समर्थ पापीसे वैर करना उचित नहीं १६० २०१-शोचनीय कौन है ? १६१ २०२-परमार्थसे विमुख ही अंधा है १६१ २०३-मनुष्य आँख होते हुए भी मृत्युको नहीं देखते १६२ २०४-मूढ़ उपदेश नहीं सुनते १६२ २०५-बार-बार सोचनेकी आवश्यकता १६३ २०६-मूर्खशिरोमणि कौन है? १६३ २०७-ईश्वरविमुखकी दुर्गति ही होती है १६३ विषय पृष्ठ-संख्या २०८-जान-बूझकर अनीति करनेवालेको उपदेश देना व्यर्थ है १६४ २०९-जगत्‌के लोगोंको रिझानेवाला मूर्ख है १६४ २१०-प्रतिष्ठा दुःखका मूल है १६५ २११-भेड़ियाधंसानका उदाहरण १६६ २१२-ऐश्वर्य पाकर मनुष्य अपनेको निडर मान बैठते हैं १६६ २१३-नौकर स्वामीकी अपेक्षा अधिक अत्याचारी होते हैं १६८ २१४-राजाको कैसा होना चाहिये ? १७० २१५-राजनीति १७१ २१६-किसका राज्य अचल हो जाता है ? १७३ २१७-आज्ञाकारी सेवक स्वामी- से बड़ा होता है ? १७७ २१८-मूलके अनुसार बढ़ने- वाला और बिना अभि- मान किये सबको सुख देनेवाला पुरुष ही श्रेष्ठ है १७७

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[ १२ ] विषय पृष्ठ-संख्या | विषय पृष्ठ-संख्या २१९—त्रिभुवनके दीप कौन हैं? १७८ | २२९—जीवन किनका सफल है १८२ २२०—कीर्ति करतूतिसे ही | २३०—पिताकी आज्ञाका पालन होती है १७८ | सुखका मूल है १८२ २२१—बड़ोंका आश्रय भी | २३१—स्त्रीके लिये पति-सेवा मनुष्यको बड़ा बना | ही कल्याणदायिनी है १८३ देता है १७८ | २३२—शरणागतका त्याग पाप- २२२—कपटी दानीकी दुर्गति १७९ | का मूल है १८४ २२३—अपने लोगोंके छोड़ | २३३—कलियुगका वर्णन १८४ देनेपर सभी वैरी हो | २३४—और चाहे जो भी घट जाते हैं १७९ | जाय, भगवान्में प्रेम २२४—साधनसे मनुष्य ऊपर | नहीं घटना चाहिये १८६ उठता है और साधन | २३५—कुसमयका प्रभाव १८८ बिना गिर जाता है १८० | २३६—श्रीरामजीके गुणोंकी २२५—सज्जनको दुष्टोंका सङ्ग | महिमा १८९ भी मङ्गलदायक होता है १८० | २३७—कलियुगमें दो ही २२६—कलियुगमें कुटिलताकी | आधार हैं १९० वृद्धि १८१ | २३८—भगवत्प्रेम ही सब २२७—आपसमें मेल रखना | मङ्गलोंकी खान है १९० उत्तम है १८१ | २३९—दोहावलीके दोहोंकी २२८—सब समय समतामें | महिमा १९१ स्थित रहनेवाले पुरुष | २४०—रामकी दीनबन्धुता १९२ ही श्रेष्ठ हैं १८१ |

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संख्या ८२ ८३ ८४ ८६ ८६ ८६ ८६ ८९ ९० ९० ९१ ९२

१. दोहा १-१५०: श्रीराम-नाम महिमा, अनन्य भक्ति एवं चातक-प्रेम

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दोहावली श्रीरामचतुष्टय

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श्रीसीतारामाभ्यां नमः दोहावली ध्यान राम बाम दिसि जानकी लखन दाहिनी ओर। ध्यान सकल कल्यानमय सुरतरु तुलसी तोर ॥१॥ भावार्थ—भगवान् श्रीरामजीकी बायीं ओर श्रीजानकीजी हैं और दाहिनी ओर श्रीलक्ष्मणजी हैं—यह ध्यान सम्पूर्णरूपसे कल्याण- मय है। हे तुलसी ! तेरे लिये तो यह मनमाना फल देनेवाला कल्प- वृक्ष ही है ॥ १ ॥ सीता लखन समेत प्रभु सोहत तुलसीदास। हरषत सुर बरषत सुमन सगुन सुमंगल बास ॥२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीसीताजी और श्रीलक्ष्मण- जीके सहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सुशोभित हो रहे हैं, देवतागण हर्षित होकर फूल बरसा रहे हैं। भगवान्‌का यह सगुण ध्यान सुमङ्गल— परम कल्याणका निवासस्थान है ॥ २ ॥ पंचबटी बट बिटप तर सीता लखन समेत। सोहत तुलसीदास प्रभु सकल सुमंगल देत ॥३॥ भावार्थ—पंचवटीमें वटवृक्षके नीचे श्रीसीताजी और श्रीलक्ष्मणजी- समेत प्रभु श्रीरामजी सुशोभित हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि यह ध्यान सब सुमङ्गलोंको देता है ॥ ३ ॥

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१४ दोहावली राम-नाम-जपकी महिमा चित्रकूट सब दिन बसत प्रभु सिय लखन समेत । राम नाम जप जापकहि तुलसी अभिमत देत ॥४॥ भावार्थ—श्रीसीताजी और श्रीलक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामजी चित्रकूटमें सदा-सर्वदा निवास करते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि वे राम-नामका जप जपनेवालेको इच्छित फल देते हैं ॥४॥ पय अहार* फल खाइ जपु राम नाम षट मास । सकल सुमंगल सिद्धि सब करतल तुलसीदास ॥५॥ भावार्थ—छः महीनेतक केवल दूधका आहार करके अथवा फल खाकर राम-नामका जप करो। तुलसीदासजी कहते हैं कि ऐसा करनेसे सब प्रकारके सुमङ्गल और सब सिद्धियाँ करतलगत हो जायँगी (अर्थात अपने-आप ही मिल जायँगी) ॥५॥ राम नाम मनिदीप धरू जीह देहरीं द्वार । तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर ॥६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि तू भीतर और बाहर दोनों ओर प्रकाश (लौकिक एवं पारमार्थिक ज्ञान) चाहता है तो *किसी-किसी प्रतिमें 'पय अह्लाई' पाठ मिलता है; जिसका अर्थ होगा '[चित्रकूटमें स्थित] पयस्विनी नदीमें स्नान करके'। 'पय अहार' और 'फल खाइ' पाठ लेनेसे 'अहार' और 'खाइ' में जो द्विरुक्ति प्रतीत होती है, उसीके निवारणके लिये सम्भवतः 'अहार' के स्थानमें 'अह्लाइ' संशोधन पीछेसे किया गया है। किंतु इस प्रकारके प्रयोग गोस्वामीजीने अन्यत्र भी किये हैं—देखिये रामचरितमानस अयोध्याकाण्डका दोहा १८८— पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग । करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग ॥

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दोहावली ३५ मुखरूपी दरवाजेकी देहलीपर रामनामरूपी [हवाके झोंके अथवा तेलकी कमीसे कभी न बुझनेवाला नित्य प्रकाशमय] मणिदीप रख दो (अर्थात् जीभके द्वारा अखण्डरूपसे श्रीराम-नामका जप करता रह) ॥६॥ हियँ निर्गुन नयनन्हि सगुन रसना राम सुनाम । मनहुँ पुरट संपुट लसत तुलसी ललित ललाम ॥७॥ भावार्थ—हृदयमें निर्गुण ब्रह्मका ध्यान, नेत्रोंके सामने प्रथम तीन दोहोंमें कथित सगुण स्वरूपकी सुन्दर झाँकी और जीभसे सुन्दर राम-नामका जप करना। तुलसीदासजी कहते हैं कि यह ऐसा है मानो सोनेकी सुन्दर डिबियामें मनोहर रत्न सुशोभित हो। श्रीगुसाईंजीके मतसे 'राम' नाम निर्गुण ब्रह्म और सगुण भगवान् दोनोंसे बड़ा है—'मोरें मत बड़ नाम दुहू तें'। नामकी इसी महिमाको लक्ष्यमें रखकर यहाँ नामको रत्न कहा गया है तथा निर्गुण ब्रह्म और सगुण भगवान्‌को उस अमूल रत्नको सुरक्षित रखनेके लिये सोनेका सम्पुट (डिबियाके नीचे-ऊपरके भाग) बताया गया है॥७॥ सगुन ध्यान रुचि सरस नहिं निर्गुन मन ते दूरि । तुलसी सुमिरहु रामको नाम सजीवन मूरि ॥८॥ भावार्थ—सगुणरूपके ध्यानमें तो प्रीतियुक्त रुचि नहीं है और निर्गुणस्वरूप मनसे दूर है (यानी समझमें नहीं आता) । तुलसीदासजी कहते हैं कि ऐसी दशामें रामनाम-स्मरणरूपी संजीवनी बूटीका सदा सेवन करो ॥८॥ एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ । तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ ॥९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—देखो, श्रीरघुनाथजीके नाम

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१६ दोहावली (राम) के दोनों अक्षरोंमें एक 'र' तो (रेफ ॔ के रूपमें) सब वर्णोंके मस्तकपर छत्रकी भांति विराजता है और दूसरा 'म' (अनुस्वार, के रूपमें) सबके ऊपर मुकुट-मणिके समान सुशोभित होता है ॥९॥ नाम रामको अंक है सब साधन हैं सून। अंक गएँ कछु हाथ नहिं अंक रहें दस गून ॥१०॥ भावार्थ—श्रीरामजीका नाम अङ्क है और सब साधन शून्य (०) हैं। अङ्क न रहनेपर तो कुछ भी हाथ नहीं लगता, परंतु शून्यके पहले अङ्क आनेपर वे दसगुने हो जाते हैं (अर्थात् रामनामके जपके साथ जो साधन होते हैं, वे दसगुने लाभदायक हो जाते हैं), परंतु रामनामसे हीन जो साधन होता है वह कुछ भी फल नहीं देता ॥१०॥ नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु। जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु ॥११॥ भावार्थ—कलियुगमें श्रीरामजीका नाम कल्पवृक्ष (मनचाहा पदार्थ देनेवाला) है और कल्याणका निवास (मुक्तिका घर) है, जिसको स्मरण करनेसे तुलसीदास भाँगसे (विषयमदसे भरी और दूसरोंको भी विषयमद उपजानेवाली साधुओंद्वारा त्याज्य स्थितिसे) बदलकर तुलसीके समान (निर्दोष, भगवानका प्यारा, सबका आदरणीय और जगतको पावन करनेवाला) हो गया ॥११॥ राम नाम जपि जीहँ जन भए सुकृत सुखसालि। तुलसी इहाँ जो आलसी गयो आजु की कालि ॥१२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जीभसे रामनामका जप करके लोग पुण्यात्मा और परम सुखी हो गये; परंतु इस नाम- जपमें जो आलस्य करते हैं, उन्हें तो आज या कल नष्ट ही हुआ